शिखर
कभी- कभी लगता है
मेरी आँखे वाटर प्रुफ है
तभी तो बाहर का पानी बाहर
और भीतर की आर्द्रता
हमेशा भीतर गलती सडती है.....
सचमुच
वाटरप्रुफ चीजो के अन्दर
पानी ही नही
धूप का भी निषेध होता है
तभी तो भीतर की चीजे
सूख नही पाती
बल्कि सीलन समाते समाते
भरभराने लगती है
और फिर सुखने की तडप मे
शुष्क हो जाती है
शनिवार, 24 मई 2008
बुधवार, 21 मई 2008
पायदान पर पिता
प्रभात रंजन
( संदर्भ -- हुआ यूं कि कुछ दिन पहले अनायास इंडिया टूडे के विशेषांक पर नजर पड़ गई । इसमें 60 महानतम भारतीयों का चयन है... (मापदंड का जिक्र नहीं )। इसमें दस लोगों की एक और सूची है जो इंटरनेट और दूसरे तरीकों से जनता की राय लेकर बनाई गई है । सबसे ज्यादा वोट भगतसिंह को मिले है और उसके बाद सुभाष चन्द्र बोस को। तीसरे पायदान पर महात्मा गांधी हैं ।)
उन दिनों तमाम दूसरी नई चीजों के अलावा गांधी जी पर बहस करना भी एक नया और अजीब शौक था । जिस मैदान में हम क्रिकेट खेलते थे ,उसके एक कोने में गांधी जी की एक प्रतिमा थी। और यह भी एक वजह थी कि रोज शाम में खेल चूकने के बाद मगज़मारी का जो सिलसिला शुरू होता था उसमें अक्सर गांधीजी ही छाये रहते थे । वैसे ये बहस क्लास रूम से लेकर सब्जी बाजार तक कहीं और कभी भी हो सकती थी .... बस दो- चार मित्रों की जरूरत होती थी । वैसे करने को तो और भी कई बातें थी , मसलन क्रिकेट या शहर में हुई कोई वारदात लेकिन जो उत्तेजना गांधी जी के मामले में होती थी , उसका कोई सानी नहीं था। गांधी जी के नाम पर जो बवाल होते थे उसकी तह में दो - तीन ही लोग थे। भगत सिंह , सुभाष और नेहरू। और कुल मिलाकर दो- चार बातें .... जो अहिंसा और गांधी जी के मुस्लिम प्रेम से जुड़ी थी । कभी-कभार बेतुकी और बेहुदा बातें भी इसमें शामिल हो जाती थी, लेकिन मोटे तौर पर यार लोग इतिहास के इर्द – गिर्द रहने का प्रयास करते थे । ये अलग बात है कि सुनी – सुनाई हमारी बातों में इतिहास, हमारी उम्र जितना ही होता था। आखिरी बात .... उन दिनों कभी ऐसा मौका नहीं आया जब भगत सिंह , सुभाष और नेहरू को लेकर गांधीजी ने भला बुरा नहीं सुना हो । यहां तक कि देश को तबाह ओ बरबाद करने का संगीन इल्जाम भी उनके ही मत्थे था । भगत सिंह और सुभाष की बात करते करते यार लोग इतने भावुक हो जाते कि एक चुप्पी सी पसर जाती और इस खालीपन में नाथुराम गोडसे की आत्मा गोते लगाने लगती थी।
खैर होंठो के ऊपर मूंछ का एहसास अभी ताजा था , और रगों में खून ने उबाल मारना तुरंत ही शुरू किया था । जो था ... लाजिमी था।
ये हाई स्कूल के दिन थे ।
फिर एक लम्बा अरसा गुजर गया। गुजरे सालों में देश बहुत बदला। इतिहास क्योंकि बदल नहीं सकता था , इसलिए बदला नहीं जा सका। गांधी जी बदस्तूर राष्ट्रपिता बने रहे और भगत सिंह शहीदेआजम । लेकिन एक चीज और नहीं बदली..... गांधी जी और भगत सिंह को लेकर हमारी किशोरवय सोच । हाई स्कूल के छात्रों की तरह आज भी गांधी जी के खिलाफ बोलना बौद्धिक दबंगई के लिए जरूरी है। दूसरी ओर दीवार पर क्रांति लिखने वालों की एक जमात आज भी भगत सिंह को झंडे की तरह उठाए हुए है। कोई इंटरनेट पोल के माध्यम से जानने का बचकाना प्रयास करता है कि गांधी बड़े या भगत- सुभाष । और लोग बेचारे ..... तीसरे पायदान पर फेंक देते है महात्मा को ।
यूं तो हम कई मसलों पर लगातार बहस में हैं..... जाति , धर्म , सांप्रदायिकता , शायर ,समाज और न जाने क्या – क्या । लेकिन गांधी जी पर भी गाहे बिगाहे एक गंभीर बहस की दरकार है ।
एक नई बहस इस लिए भी जरूरी है , क्योंकि अब हम हाई स्कूल में नहीं है।
आइए शुरू करें .....।
( संदर्भ -- हुआ यूं कि कुछ दिन पहले अनायास इंडिया टूडे के विशेषांक पर नजर पड़ गई । इसमें 60 महानतम भारतीयों का चयन है... (मापदंड का जिक्र नहीं )। इसमें दस लोगों की एक और सूची है जो इंटरनेट और दूसरे तरीकों से जनता की राय लेकर बनाई गई है । सबसे ज्यादा वोट भगतसिंह को मिले है और उसके बाद सुभाष चन्द्र बोस को। तीसरे पायदान पर महात्मा गांधी हैं ।)
उन दिनों तमाम दूसरी नई चीजों के अलावा गांधी जी पर बहस करना भी एक नया और अजीब शौक था । जिस मैदान में हम क्रिकेट खेलते थे ,उसके एक कोने में गांधी जी की एक प्रतिमा थी। और यह भी एक वजह थी कि रोज शाम में खेल चूकने के बाद मगज़मारी का जो सिलसिला शुरू होता था उसमें अक्सर गांधीजी ही छाये रहते थे । वैसे ये बहस क्लास रूम से लेकर सब्जी बाजार तक कहीं और कभी भी हो सकती थी .... बस दो- चार मित्रों की जरूरत होती थी । वैसे करने को तो और भी कई बातें थी , मसलन क्रिकेट या शहर में हुई कोई वारदात लेकिन जो उत्तेजना गांधी जी के मामले में होती थी , उसका कोई सानी नहीं था। गांधी जी के नाम पर जो बवाल होते थे उसकी तह में दो - तीन ही लोग थे। भगत सिंह , सुभाष और नेहरू। और कुल मिलाकर दो- चार बातें .... जो अहिंसा और गांधी जी के मुस्लिम प्रेम से जुड़ी थी । कभी-कभार बेतुकी और बेहुदा बातें भी इसमें शामिल हो जाती थी, लेकिन मोटे तौर पर यार लोग इतिहास के इर्द – गिर्द रहने का प्रयास करते थे । ये अलग बात है कि सुनी – सुनाई हमारी बातों में इतिहास, हमारी उम्र जितना ही होता था। आखिरी बात .... उन दिनों कभी ऐसा मौका नहीं आया जब भगत सिंह , सुभाष और नेहरू को लेकर गांधीजी ने भला बुरा नहीं सुना हो । यहां तक कि देश को तबाह ओ बरबाद करने का संगीन इल्जाम भी उनके ही मत्थे था । भगत सिंह और सुभाष की बात करते करते यार लोग इतने भावुक हो जाते कि एक चुप्पी सी पसर जाती और इस खालीपन में नाथुराम गोडसे की आत्मा गोते लगाने लगती थी।
खैर होंठो के ऊपर मूंछ का एहसास अभी ताजा था , और रगों में खून ने उबाल मारना तुरंत ही शुरू किया था । जो था ... लाजिमी था।
ये हाई स्कूल के दिन थे ।
फिर एक लम्बा अरसा गुजर गया। गुजरे सालों में देश बहुत बदला। इतिहास क्योंकि बदल नहीं सकता था , इसलिए बदला नहीं जा सका। गांधी जी बदस्तूर राष्ट्रपिता बने रहे और भगत सिंह शहीदेआजम । लेकिन एक चीज और नहीं बदली..... गांधी जी और भगत सिंह को लेकर हमारी किशोरवय सोच । हाई स्कूल के छात्रों की तरह आज भी गांधी जी के खिलाफ बोलना बौद्धिक दबंगई के लिए जरूरी है। दूसरी ओर दीवार पर क्रांति लिखने वालों की एक जमात आज भी भगत सिंह को झंडे की तरह उठाए हुए है। कोई इंटरनेट पोल के माध्यम से जानने का बचकाना प्रयास करता है कि गांधी बड़े या भगत- सुभाष । और लोग बेचारे ..... तीसरे पायदान पर फेंक देते है महात्मा को ।
यूं तो हम कई मसलों पर लगातार बहस में हैं..... जाति , धर्म , सांप्रदायिकता , शायर ,समाज और न जाने क्या – क्या । लेकिन गांधी जी पर भी गाहे बिगाहे एक गंभीर बहस की दरकार है ।
एक नई बहस इस लिए भी जरूरी है , क्योंकि अब हम हाई स्कूल में नहीं है।
आइए शुरू करें .....।
मंगलवार, 20 मई 2008
अब क्या करेगी सरकार ?
ओमप्रकाश
मुहावरा मुंह चिढ़ाने का सही उदाहरण शायद इससे बेहतर कोई नहीं हो सकता। महंगाई का आंकड़ा जैसे-जैसे ऊपर जा रहा है वैसे-वैसे हमारे महान अर्थशास्त्री चिदंबरम साहब और प्रधानमंत्री महोदय की फ़जीहत भी नए रिकॉर्ड बना रही है। आज मुद्रास्फीति 7.83 फीसदी तक जा पहुंची है, यानी 44 महीनों में सबसे ज्यादा। दावों पर दावे लेकिन मुद्रास्फीति 8 वें पायदान पर पहुंचने का बेताब सबको चिढ़ा रहा है। कर लो जो करना है। ये महंगाई ज्यादा ख़तरनाक दिखती है। इसलिए क्योंकि सरकार के पास करने को ज्यादा कुछ बचा नहीं है। पिछले दिनों ही रिज़र्व बैंक ने बाज़ार से पैसा हटाने के लिए अपने नगद आरक्षित अनुपात में 75 बेसिस अंक तक की बढ़त की। उम्मीद थी कि बाज़ार से 26 से 29 हज़ार करोड़ रुपयों तक की तरलता कम हो जाएगी। नतीजा लोगों के पास पैसे कम होगें तो, मांग कम होगी और महंगाई पर लगाम लगेगी। सरकार ने आपूर्ति ठीक करने के दावे किए लेकिन परिणाम दिखता नहीं। जानकार चेतावनी दे रहे हैं कि महंगाई का ये सूचकांक 8 फीसदी के ऊपर जाकर रहेगा।
सरकार की इन कोशिशों को धक्का रुपए की कमज़ोरी के कारण भी लगा है। पिछले साल जहां परेशानी इस बात की थी कि रुपया ज़रुरत से ज्यादा इठला रहा था तो इस बार मामला उलटा है। चिंता का कारण पेट्रोलियम के बढ़ते दाम भी हैं। वहीं, सरकारी पेट्रोलियम कंपनियां भी बाप-बाप कर रही हैं। रुपए के कमज़ोर होने से आयात महंगा हुआ है, जिसका सीधा असर पेट्रोलियम उत्पादों पर पड़ा है। लेकिन चुनावी साल में सरकार भी बेबस बनी काग़ज काले किए जा रही है। नतीजा, सब्सिडी का बोझ सरकार पर बढ़ता जा रहा है। लग रहा है कि ये सब्सिडी का बिल जीडीपी के 5 फीसदी तक जा सकती हैं। ऐसे में एक सवाल और कि सरकार के बजटिय घाटा का क्या होगा।
महंगाई के साथ साथ एक और बात के लिए तैयार रहिए। वो है तेज़ जीडीपी रफ़्तार आपको रेंगती नज़र आ सकती है।
मुहावरा मुंह चिढ़ाने का सही उदाहरण शायद इससे बेहतर कोई नहीं हो सकता। महंगाई का आंकड़ा जैसे-जैसे ऊपर जा रहा है वैसे-वैसे हमारे महान अर्थशास्त्री चिदंबरम साहब और प्रधानमंत्री महोदय की फ़जीहत भी नए रिकॉर्ड बना रही है। आज मुद्रास्फीति 7.83 फीसदी तक जा पहुंची है, यानी 44 महीनों में सबसे ज्यादा। दावों पर दावे लेकिन मुद्रास्फीति 8 वें पायदान पर पहुंचने का बेताब सबको चिढ़ा रहा है। कर लो जो करना है। ये महंगाई ज्यादा ख़तरनाक दिखती है। इसलिए क्योंकि सरकार के पास करने को ज्यादा कुछ बचा नहीं है। पिछले दिनों ही रिज़र्व बैंक ने बाज़ार से पैसा हटाने के लिए अपने नगद आरक्षित अनुपात में 75 बेसिस अंक तक की बढ़त की। उम्मीद थी कि बाज़ार से 26 से 29 हज़ार करोड़ रुपयों तक की तरलता कम हो जाएगी। नतीजा लोगों के पास पैसे कम होगें तो, मांग कम होगी और महंगाई पर लगाम लगेगी। सरकार ने आपूर्ति ठीक करने के दावे किए लेकिन परिणाम दिखता नहीं। जानकार चेतावनी दे रहे हैं कि महंगाई का ये सूचकांक 8 फीसदी के ऊपर जाकर रहेगा।सरकार की इन कोशिशों को धक्का रुपए की कमज़ोरी के कारण भी लगा है। पिछले साल जहां परेशानी इस बात की थी कि रुपया ज़रुरत से ज्यादा इठला रहा था तो इस बार मामला उलटा है। चिंता का कारण पेट्रोलियम के बढ़ते दाम भी हैं। वहीं, सरकारी पेट्रोलियम कंपनियां भी बाप-बाप कर रही हैं। रुपए के कमज़ोर होने से आयात महंगा हुआ है, जिसका सीधा असर पेट्रोलियम उत्पादों पर पड़ा है। लेकिन चुनावी साल में सरकार भी बेबस बनी काग़ज काले किए जा रही है। नतीजा, सब्सिडी का बोझ सरकार पर बढ़ता जा रहा है। लग रहा है कि ये सब्सिडी का बिल जीडीपी के 5 फीसदी तक जा सकती हैं। ऐसे में एक सवाल और कि सरकार के बजटिय घाटा का क्या होगा।
महंगाई के साथ साथ एक और बात के लिए तैयार रहिए। वो है तेज़ जीडीपी रफ़्तार आपको रेंगती नज़र आ सकती है।
शनिवार, 17 मई 2008
तेरी याद में
गोपी कृष्ण सहाय
चले गए तब ज्ञात हुआ , अपना खोना क्या होता है !
याद में तेरे साथी मेरे , घर आंगन भी रोता है !!
वही आंगन ढ़ूढते थे तुम , मै कहीँ छुप जाता था
कई सवाल पूछोगे ये , सोच नजर चुराता था !!
बड़े जटिल लगते थे , प्रश्न तेरे सीधे सादे !लौट के ना आओगे तुम , इस मन को समझाता हूँ !
पर तेरी यादों की दस्तक , हर कोने मे पाता हूँ !!
माना अब हमने तेरे बिन , मुस्कुराना सिख लिया !
वक्त के साथ अकेले ही , कदम मिलाना सिख लिया !!
अगले जनम तुमको इश्वर , फिर हमसे ही मिलवादे !
चले गए तब ज्ञात हुआ , अपना खोना क्या होता है !
याद में तेरे साथी मेरे , घर आंगन भी रोता है !!
वही आंगन ढ़ूढते थे तुम , मै कहीँ छुप जाता था
कई सवाल पूछोगे ये , सोच नजर चुराता था !!
बड़े जटिल लगते थे , प्रश्न तेरे सीधे सादे !लौट के ना आओगे तुम , इस मन को समझाता हूँ !
पर तेरी यादों की दस्तक , हर कोने मे पाता हूँ !!
माना अब हमने तेरे बिन , मुस्कुराना सिख लिया !
वक्त के साथ अकेले ही , कदम मिलाना सिख लिया !!
अगले जनम तुमको इश्वर , फिर हमसे ही मिलवादे !
जीवन मृत्यु
आज मै चुपचाप बैठी सोच रही थी
अपने ही भावो मे कितनी उलझ रही थी
कि जिन्दगी और मौत कितनी करीब है
एक संसार मे लाती है तो दुसरी ले जाती है
लेकिन शमशान घाट पर ही
जाकर वैराग्य क्यो जागते .है
और मृत्यु पर ही सारे सगे सम्बन्धी ,
बिलख बिलख कर रोते क्यो है
शायद यहाँ हम एक पूरी जिन्दगी
का अन्त पाते है.
मरने वाले तो मर जाते है
पर कुछ लोग उनकी मृत्यु मे
अपना सारा जीवन तलाशते है(मेरी माँ)
अपने ही भावो मे कितनी उलझ रही थी
कि जिन्दगी और मौत कितनी करीब है
एक संसार मे लाती है तो दुसरी ले जाती है
लेकिन शमशान घाट पर ही
जाकर वैराग्य क्यो जागते .है
और मृत्यु पर ही सारे सगे सम्बन्धी ,
बिलख बिलख कर रोते क्यो है
शायद यहाँ हम एक पूरी जिन्दगी
का अन्त पाते है.
मरने वाले तो मर जाते है
पर कुछ लोग उनकी मृत्यु मे
अपना सारा जीवन तलाशते है(मेरी माँ)
शुक्रवार, 9 मई 2008
मासूम बुश और मुटाते हम
ओमप्रकाश
हम फिल्मों में काफी पहले से देखते आ रहे हैं कि जुड़वा भाईयों के बीच इतना प्यार होता है कि एक को मारे तो दूसरे को लगे। ऐसा ही कुछ रिश्ता हमारा अमेरिका के साथ हो गया है। खाएं हम पेट दरद हो उनका। अरे, अब ये दरद नहीं है तो और क्या है। बुश साहब कहते हैं कि पूरी दुनिया की महंगाई के लिए भारत का मध्य वर्ग ज़िम्मेवार है। 35 करोड़ का विशाल भारतीय मध्य वर्ग। महाशक्ति अमेरिका की पूरी आबादी से भी बड़ा। राष्ट्रपति महोदय का कहना है कि भारत का ये वर्ग खा खाकर मुटा रहा है। लेकिन अफसोस कि उनके ही इशारे पर चलने वाले संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े उन्हें झूठा साबित करते हैं। हमारे मासूम से बुश साहब को कोई बताए कि पिछले सालों में अमेरिका में अनाज की खपत 12 फीसदी की दर से बढ़ी है जबकि हमारे यहां सिर्फ 2.5 फीसदी। अरे, सिर्फ पिछले साल की बात करें तो अमेरिका में अनाज की खपत 31 करोड़ टन से भी ज्यादा रही तो वहीं, भारत में 20 करोड़ टन से भी कम। अब क्या बताए बेचारे बुश पूरी दूनिया की फिकर उन्हें इतना सताती है कि इन छोटी मोटी बातों की तरफ उनका ध्यान ही नहीं जा पाता।
हां, बुश महाश्य को ये भी बता दें कि खु़द उनके ही देश में मक्का को बड़े पैमाने पर जैव-ईंधन के लिय इस्तेमाल किया जा रहा है। साथ ही जानकार बताते हैं कि 2010 तक अमेरिका में 30 फीसदी मक्का का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने के लिए होगा। लेकिन अब ये तय करना होगा कि पूरी दुनिया के 80 करोड़ कार मालिकों के लिए ईंधन तैयार करने में अनाज का लगाना है या भूखमरी के शिकार 1.5 अरब लोगों का पेट भरना।
हां, बुश महाश्य को ये भी बता दें कि खु़द उनके ही देश में मक्का को बड़े पैमाने पर जैव-ईंधन के लिय इस्तेमाल किया जा रहा है। साथ ही जानकार बताते हैं कि 2010 तक अमेरिका में 30 फीसदी मक्का का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने के लिए होगा। लेकिन अब ये तय करना होगा कि पूरी दुनिया के 80 करोड़ कार मालिकों के लिए ईंधन तैयार करने में अनाज का लगाना है या भूखमरी के शिकार 1.5 अरब लोगों का पेट भरना।
गुरुवार, 1 मई 2008
मल्ल युद्ध
मनोज भाई को बतकही के दौरान सुनना एक शानदार अनुभव है लेकिन पढ़ना तो बस कमाल है । तलवार की नोक से गुदगुदाने की कला जानते है, बशर्ते सुनने वाला लापरवाह न हो।
मनोज मेहता आजकल इंडिया न्यूज में विशेष संवाददाता हैं। अपने संकलन से एक कविता हलफ़नामा के तौर पर भेजी है।
_______________________________
ताल ठोकते
आमने सामने दो वीर
नगाड़े - ढोलक
चीख – पुकार
उमड़ता हुआ पूरा गांव
मिट्टी और पसीने का
मुंह में फैला – एक सा स्वाद
अवसर फिसलने की निराशा
दबोच लेने के
तमाम पैंतरों के बीच
जरूरी नहीं है यह जिक्र
कि इनके पास होता था
हजार – हजार हाथियों का बल
ये राजा होते थे
सेनापति होते थे
और हस्तिनापुर , मगध , काशी
हर जगह पाये जाते थे
ये पी जाते थे
दसियों मन दूध
सेरो घी
लगाते थे
कई – कई योजन का चक्कर
हजारों बैठकें
और ललकार भर देने से
मच जाता था घमासान
जूझते थे हफ्तों – अथक
अब कोई वैसे ललकारे
तो हंसी होगी उसकी
रणनीतिक भूल
कि न्यूज चैनलों के हित ही
अब लड़े जाते हैं युद्ध
कि जब तक वह कसेगा अपनी लंगोट
तब तक खुल जाएगा
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ का पिटारा
और उसके मसखरे
निकल कर टहलने लगेंगे
वायरस की तरह
लोगों के दिमाग में
कि गिर जाएगा
शेयर बाजार का पहाड़ उसकी पीठ पर
और वह मन ही मन
पूजता रह जाएगा
महावीर जी को
मौका ऐसे ही किसी कारण
चूक जाएगा कोई एक
और दूसरा
धम्म से जा बैठेगा
उसकी छाती पर
उमेठने लगेगा उसकी गर्दन
शोर का एक बवंडर उठेगा
थकान , प्यास
ऐंठती हुई अंतड़ियों
और पसीने से लिथड़ा
अखाड़े की छाती से उठ कर
वह दौड़ने लगेगा
चक्राकार
ढोल – नगाड़े
बरसते हुए पैसों
और जयकार के बीच
एक हाथ में
प्रतिरोध का
पूर्व पाषाणयुगीन विकल्प लिए।
मनोज मेहता आजकल इंडिया न्यूज में विशेष संवाददाता हैं। अपने संकलन से एक कविता हलफ़नामा के तौर पर भेजी है।
_______________________________
ताल ठोकते
आमने सामने दो वीर
नगाड़े - ढोलक
चीख – पुकार
उमड़ता हुआ पूरा गांव
मिट्टी और पसीने का
मुंह में फैला – एक सा स्वाद
अवसर फिसलने की निराशा
दबोच लेने के
तमाम पैंतरों के बीच
जरूरी नहीं है यह जिक्र
कि इनके पास होता था
हजार – हजार हाथियों का बल
ये राजा होते थे
सेनापति होते थे
और हस्तिनापुर , मगध , काशी
हर जगह पाये जाते थे
ये पी जाते थे
दसियों मन दूध
सेरो घी
लगाते थे
कई – कई योजन का चक्कर
हजारों बैठकें
और ललकार भर देने से
मच जाता था घमासान
जूझते थे हफ्तों – अथक
अब कोई वैसे ललकारे
तो हंसी होगी उसकी
रणनीतिक भूल
कि न्यूज चैनलों के हित ही
अब लड़े जाते हैं युद्ध
कि जब तक वह कसेगा अपनी लंगोट
तब तक खुल जाएगा
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ का पिटारा
और उसके मसखरे
निकल कर टहलने लगेंगे
वायरस की तरह
लोगों के दिमाग में
कि गिर जाएगा
शेयर बाजार का पहाड़ उसकी पीठ पर
और वह मन ही मन
पूजता रह जाएगा
महावीर जी को
मौका ऐसे ही किसी कारण
चूक जाएगा कोई एक
और दूसरा
धम्म से जा बैठेगा
उसकी छाती पर
उमेठने लगेगा उसकी गर्दन
शोर का एक बवंडर उठेगा
थकान , प्यास
ऐंठती हुई अंतड़ियों
और पसीने से लिथड़ा
अखाड़े की छाती से उठ कर
वह दौड़ने लगेगा
चक्राकार
ढोल – नगाड़े
बरसते हुए पैसों
और जयकार के बीच
एक हाथ में
प्रतिरोध का
पूर्व पाषाणयुगीन विकल्प लिए।
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