गोपी कृष्ण सहाय
चले गए तब ज्ञात हुआ , अपना खोना क्या होता है !
याद में तेरे साथी मेरे , घर आंगन भी रोता है !!
वही आंगन ढ़ूढते थे तुम , मै कहीँ छुप जाता था
कई सवाल पूछोगे ये , सोच नजर चुराता था !!
बड़े जटिल लगते थे , प्रश्न तेरे सीधे सादे !लौट के ना आओगे तुम , इस मन को समझाता हूँ !
पर तेरी यादों की दस्तक , हर कोने मे पाता हूँ !!
माना अब हमने तेरे बिन , मुस्कुराना सिख लिया !
वक्त के साथ अकेले ही , कदम मिलाना सिख लिया !!
अगले जनम तुमको इश्वर , फिर हमसे ही मिलवादे !
शनिवार, 17 मई 2008
जीवन मृत्यु
आज मै चुपचाप बैठी सोच रही थी
अपने ही भावो मे कितनी उलझ रही थी
कि जिन्दगी और मौत कितनी करीब है
एक संसार मे लाती है तो दुसरी ले जाती है
लेकिन शमशान घाट पर ही
जाकर वैराग्य क्यो जागते .है
और मृत्यु पर ही सारे सगे सम्बन्धी ,
बिलख बिलख कर रोते क्यो है
शायद यहाँ हम एक पूरी जिन्दगी
का अन्त पाते है.
मरने वाले तो मर जाते है
पर कुछ लोग उनकी मृत्यु मे
अपना सारा जीवन तलाशते है(मेरी माँ)
अपने ही भावो मे कितनी उलझ रही थी
कि जिन्दगी और मौत कितनी करीब है
एक संसार मे लाती है तो दुसरी ले जाती है
लेकिन शमशान घाट पर ही
जाकर वैराग्य क्यो जागते .है
और मृत्यु पर ही सारे सगे सम्बन्धी ,
बिलख बिलख कर रोते क्यो है
शायद यहाँ हम एक पूरी जिन्दगी
का अन्त पाते है.
मरने वाले तो मर जाते है
पर कुछ लोग उनकी मृत्यु मे
अपना सारा जीवन तलाशते है(मेरी माँ)
शुक्रवार, 9 मई 2008
मासूम बुश और मुटाते हम
ओमप्रकाश
हम फिल्मों में काफी पहले से देखते आ रहे हैं कि जुड़वा भाईयों के बीच इतना प्यार होता है कि एक को मारे तो दूसरे को लगे। ऐसा ही कुछ रिश्ता हमारा अमेरिका के साथ हो गया है। खाएं हम पेट दरद हो उनका। अरे, अब ये दरद नहीं है तो और क्या है। बुश साहब कहते हैं कि पूरी दुनिया की महंगाई के लिए भारत का मध्य वर्ग ज़िम्मेवार है। 35 करोड़ का विशाल भारतीय मध्य वर्ग। महाशक्ति अमेरिका की पूरी आबादी से भी बड़ा। राष्ट्रपति महोदय का कहना है कि भारत का ये वर्ग खा खाकर मुटा रहा है। लेकिन अफसोस कि उनके ही इशारे पर चलने वाले संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े उन्हें झूठा साबित करते हैं। हमारे मासूम से बुश साहब को कोई बताए कि पिछले सालों में अमेरिका में अनाज की खपत 12 फीसदी की दर से बढ़ी है जबकि हमारे यहां सिर्फ 2.5 फीसदी। अरे, सिर्फ पिछले साल की बात करें तो अमेरिका में अनाज की खपत 31 करोड़ टन से भी ज्यादा रही तो वहीं, भारत में 20 करोड़ टन से भी कम। अब क्या बताए बेचारे बुश पूरी दूनिया की फिकर उन्हें इतना सताती है कि इन छोटी मोटी बातों की तरफ उनका ध्यान ही नहीं जा पाता।
हां, बुश महाश्य को ये भी बता दें कि खु़द उनके ही देश में मक्का को बड़े पैमाने पर जैव-ईंधन के लिय इस्तेमाल किया जा रहा है। साथ ही जानकार बताते हैं कि 2010 तक अमेरिका में 30 फीसदी मक्का का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने के लिए होगा। लेकिन अब ये तय करना होगा कि पूरी दुनिया के 80 करोड़ कार मालिकों के लिए ईंधन तैयार करने में अनाज का लगाना है या भूखमरी के शिकार 1.5 अरब लोगों का पेट भरना।
हां, बुश महाश्य को ये भी बता दें कि खु़द उनके ही देश में मक्का को बड़े पैमाने पर जैव-ईंधन के लिय इस्तेमाल किया जा रहा है। साथ ही जानकार बताते हैं कि 2010 तक अमेरिका में 30 फीसदी मक्का का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने के लिए होगा। लेकिन अब ये तय करना होगा कि पूरी दुनिया के 80 करोड़ कार मालिकों के लिए ईंधन तैयार करने में अनाज का लगाना है या भूखमरी के शिकार 1.5 अरब लोगों का पेट भरना।
गुरुवार, 1 मई 2008
मल्ल युद्ध
मनोज भाई को बतकही के दौरान सुनना एक शानदार अनुभव है लेकिन पढ़ना तो बस कमाल है । तलवार की नोक से गुदगुदाने की कला जानते है, बशर्ते सुनने वाला लापरवाह न हो।
मनोज मेहता आजकल इंडिया न्यूज में विशेष संवाददाता हैं। अपने संकलन से एक कविता हलफ़नामा के तौर पर भेजी है।
_______________________________
ताल ठोकते
आमने सामने दो वीर
नगाड़े - ढोलक
चीख – पुकार
उमड़ता हुआ पूरा गांव
मिट्टी और पसीने का
मुंह में फैला – एक सा स्वाद
अवसर फिसलने की निराशा
दबोच लेने के
तमाम पैंतरों के बीच
जरूरी नहीं है यह जिक्र
कि इनके पास होता था
हजार – हजार हाथियों का बल
ये राजा होते थे
सेनापति होते थे
और हस्तिनापुर , मगध , काशी
हर जगह पाये जाते थे
ये पी जाते थे
दसियों मन दूध
सेरो घी
लगाते थे
कई – कई योजन का चक्कर
हजारों बैठकें
और ललकार भर देने से
मच जाता था घमासान
जूझते थे हफ्तों – अथक
अब कोई वैसे ललकारे
तो हंसी होगी उसकी
रणनीतिक भूल
कि न्यूज चैनलों के हित ही
अब लड़े जाते हैं युद्ध
कि जब तक वह कसेगा अपनी लंगोट
तब तक खुल जाएगा
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ का पिटारा
और उसके मसखरे
निकल कर टहलने लगेंगे
वायरस की तरह
लोगों के दिमाग में
कि गिर जाएगा
शेयर बाजार का पहाड़ उसकी पीठ पर
और वह मन ही मन
पूजता रह जाएगा
महावीर जी को
मौका ऐसे ही किसी कारण
चूक जाएगा कोई एक
और दूसरा
धम्म से जा बैठेगा
उसकी छाती पर
उमेठने लगेगा उसकी गर्दन
शोर का एक बवंडर उठेगा
थकान , प्यास
ऐंठती हुई अंतड़ियों
और पसीने से लिथड़ा
अखाड़े की छाती से उठ कर
वह दौड़ने लगेगा
चक्राकार
ढोल – नगाड़े
बरसते हुए पैसों
और जयकार के बीच
एक हाथ में
प्रतिरोध का
पूर्व पाषाणयुगीन विकल्प लिए।
मनोज मेहता आजकल इंडिया न्यूज में विशेष संवाददाता हैं। अपने संकलन से एक कविता हलफ़नामा के तौर पर भेजी है।
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ताल ठोकते
आमने सामने दो वीर
नगाड़े - ढोलक
चीख – पुकार
उमड़ता हुआ पूरा गांव
मिट्टी और पसीने का
मुंह में फैला – एक सा स्वाद
अवसर फिसलने की निराशा
दबोच लेने के
तमाम पैंतरों के बीच
जरूरी नहीं है यह जिक्र
कि इनके पास होता था
हजार – हजार हाथियों का बल
ये राजा होते थे
सेनापति होते थे
और हस्तिनापुर , मगध , काशी
हर जगह पाये जाते थे
ये पी जाते थे
दसियों मन दूध
सेरो घी
लगाते थे
कई – कई योजन का चक्कर
हजारों बैठकें
और ललकार भर देने से
मच जाता था घमासान
जूझते थे हफ्तों – अथक
अब कोई वैसे ललकारे
तो हंसी होगी उसकी
रणनीतिक भूल
कि न्यूज चैनलों के हित ही
अब लड़े जाते हैं युद्ध
कि जब तक वह कसेगा अपनी लंगोट
तब तक खुल जाएगा
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ का पिटारा
और उसके मसखरे
निकल कर टहलने लगेंगे
वायरस की तरह
लोगों के दिमाग में
कि गिर जाएगा
शेयर बाजार का पहाड़ उसकी पीठ पर
और वह मन ही मन
पूजता रह जाएगा
महावीर जी को
मौका ऐसे ही किसी कारण
चूक जाएगा कोई एक
और दूसरा
धम्म से जा बैठेगा
उसकी छाती पर
उमेठने लगेगा उसकी गर्दन
शोर का एक बवंडर उठेगा
थकान , प्यास
ऐंठती हुई अंतड़ियों
और पसीने से लिथड़ा
अखाड़े की छाती से उठ कर
वह दौड़ने लगेगा
चक्राकार
ढोल – नगाड़े
बरसते हुए पैसों
और जयकार के बीच
एक हाथ में
प्रतिरोध का
पूर्व पाषाणयुगीन विकल्प लिए।
मंगलवार, 15 अप्रैल 2008
एक गैर–राजनीतिक कदम
इस मुलाकात से भले ही इतिहास नहीं बदला जा सकता लेकिन, इंसानियत का चेहरा कुछ निखर सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की बेटी जेल में अपने पिता के कातिल , नलिनी श्रीहरन से मिली । नलिनी से प्रियंका की इस मुलाकात ने , किसी मसले को हल नहीं किया लेकिन गुस्से और तकलीफ से आहत दिलों को आराम जरूर देगी । प्रियंका ने कई सवाल पूछे – ऐसे कई सवाल जिनके जवाबों की दरकार नहीं थी लेकिन शायद चुप्पी तोड़ने का कोई और रास्ता नहीं रहा हो। प्रियंका 17 साल पुरानी अपनी लड़ाई को खत्म करने का इससे बेहतर जरिया नहीं तलाश सकती थी । और नलिनी पश्चताप का इससे बेहतर मौका। कानून ने तो सिर्फ अपराध की सजा दी लेकिन प्रियंका ने नलिनी की आत्मा पर लगे दागों को कुछ हल्का करने का प्रयास किया है । सार्वजनिक या राजनीतिक तमाशे से दूर प्रियंका ने अपने पिता के कातिल से कहा कि वे एक अच्छे इंसान थे और नलिनी ने बताया कि अनाथ होने के कारण उसने कभी प्यार नहीं पाया । और शायद इसी लिए थोड़ी सी सहानुभूति दिखा कर उसे राजीव हत्याकांड में शामिल कर लिया गया । हांलाकि उसे इन सबके पिछे मौजूद असली चेहरे का पता नहीं है। अब शायद इतना कह भर देने से नलिनी के लिए सांस लेना कुछ आसान हो जाए। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या वाकई नलिनी को कुछ पता नहीं है और क्या प्रियंका भावनाओं की आड़ में अपने पिता की हत्या में शामिल ऐसे लोगों की पहचान करने गई थी , जो अब तक बेनकाब है।
प्रियंका का चाहे जो भी मतलब हो -- ये मुलाकात नलिनी के लिए काफी मायने रखती है।
प्रियंका का चाहे जो भी मतलब हो -- ये मुलाकात नलिनी के लिए काफी मायने रखती है।
सोमवार, 14 अप्रैल 2008
सहयात्री
बर्दाश्त करना है
क्योंकि नांव छोड़ी नहीं जा सकती
नदी के बीचो – बीच।
नांव पर सवार
आकाश की ओर मुंह उठाये
रेकियाते/जैसे ईश्वर को गरियाते
सहयात्री, इन गदहों को (गधों को)
पार उतरने तक बर्दाश्त करना है
चोट सहना भी विवशता
चुपचाप
कौन सिर्फ प्रतिशोध के लिए मारेगा दुलत्ती
किसी गदहे को।
क्योंकि नांव छोड़ी नहीं जा सकती
नदी के बीचो – बीच।
नांव पर सवार
आकाश की ओर मुंह उठाये
रेकियाते/जैसे ईश्वर को गरियाते
सहयात्री, इन गदहों को (गधों को)
पार उतरने तक बर्दाश्त करना है
चोट सहना भी विवशता
चुपचाप
कौन सिर्फ प्रतिशोध के लिए मारेगा दुलत्ती
किसी गदहे को।
गुरुवार, 3 अप्रैल 2008
मेरा होना ----
कुछ कहने की अकुलाहट और चुप रहने की बेबसी के बीच में . एक शाम है . घर की ओझल दीवार में कहीं दहलीज की तरह. और एक मैं हूं.
मैं भी हूं. बने रहने की जरूरत और खत्म होने की बैचेनी के साथ. जैसे ये शहर है . होने और ना होने की पूरी सार्थकता के साथ .
पेड़ की फूनगियों पर रहेगी धूप . आखिर तक . कि जैसे आंखों में रहती हैं उम्मीद. और कभी सर्दियों मे कीचड़ . आखिरकार पोंछ दिए जाने तक . मैं भी रहूंगा .
मेरा होना ठीक वैसे नहीं कि, जैसे पिछली सदी की आखिरी कविता में मौजूद था एक आदमी. प्रेमिकाओं के पहने हुए गहने की तरह मेरा मूल्य है. सुखद स्मृतियॉ नहीं . बेहद तकलीफ में याद किए जाने वाले गुनाहों की तरह, क्षमा – प्रार्थनाओं में रहता हूं.
मेरा होना , भाषा में गाली होने की तरह अनिवार्य . मगर अवांछित.
मैं हूं - किसी ढ़ही हुई इमारत की कीमती जमीन की तरह .
मैं भी हूं. बने रहने की जरूरत और खत्म होने की बैचेनी के साथ. जैसे ये शहर है . होने और ना होने की पूरी सार्थकता के साथ .
पेड़ की फूनगियों पर रहेगी धूप . आखिर तक . कि जैसे आंखों में रहती हैं उम्मीद. और कभी सर्दियों मे कीचड़ . आखिरकार पोंछ दिए जाने तक . मैं भी रहूंगा .
मेरा होना ठीक वैसे नहीं कि, जैसे पिछली सदी की आखिरी कविता में मौजूद था एक आदमी. प्रेमिकाओं के पहने हुए गहने की तरह मेरा मूल्य है. सुखद स्मृतियॉ नहीं . बेहद तकलीफ में याद किए जाने वाले गुनाहों की तरह, क्षमा – प्रार्थनाओं में रहता हूं.
मेरा होना , भाषा में गाली होने की तरह अनिवार्य . मगर अवांछित.
मैं हूं - किसी ढ़ही हुई इमारत की कीमती जमीन की तरह .
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