कमबख्त, ऐसी हालत में भी राधिका- राधिका चिल्ला
रहा है। उम्र कोई 22 साल की होगी। अभी थोड़ी देर पहले मैक्स अस्पताल में इसे लाया गया
है। वह जो बदहवास सा दिख रहा है, शायद भाई है इस लड़के का। पलक झपकते डॉक्टर्स की
पूरी टीम उसके इलाज में लग गई है। एक डॉक्टर ने घुटना उसके पेट से लगा रखा है।
दूसरा डॉक्टर मुंह में पतला तार डालने की कोशिश कर रहा है। “क्या
खाया है ?”- सीनियर डॉक्टर जरा गुस्से में पूछते हैं।“राधिका नहीं
आई ?” उस पर जैसे जुनून तारी है।–“राधिका तो नहीं
आयेगी बेटा..पुलिस आ रही है..जल्दी बता क्या खाया है?”—“घर
में ढ़ेर सारे कॉम्बीफ्लेम और पैरासिटामोल के टेबलेट रखे थे, सब खा लिए”।–
“यू डफर”- । सीनियर डॉक्टर की आवाज चीखने की हद तक तेज हो
जाती है। -- “उल्टी कराओ इसकी फास्ट”।– “राधिका-
राधिका”। “चुप हो जा नहीं तो मार खायेगा”- इस बार भाई बोलता है। डॉक्टर को तसल्ली नहीं है- “किसी
को घर भेजो...पता करो इसने कुछ और तो नहीं खाया...जल्दी करो”। थोड़ी देर
में घबराई हुई एक महिला आती है- मां हैं शायद। “
चिंता की बात नहीं है...हम पेट से दवाईयां निकाल रहे हैं...हां अगर इसने कुछ और
खाया हो तो...देखते हैं”। तीन घंटे बाद डॉक्टर्स थोड़े निश्चिंत दिखाई दे
रहे हैं। “पागल है यार…गर्लफ्रेंड से मामूली झगड़ा हो गया...बात
भी क्या थी...कहीं डेट-वेट पर जाने से उसने इँकार कर दिया था..लड़के ने कारनामा कर
दिया..ठीक है अब”। अस्पताल में डेंगू के मरीजों का तांता लगा है।
मेरे दोस्त भी पड़े हुए हैं। कमीना, अपनी मेहबूबा को प्रेम और प्लेटलेटस का फंडा
समझा रहा है। कहता है- “तुम्हे देखता रहूं तो डेढ़ घंटे में प्लेटलेटस
डेढ़ लाख हो जायेगा”। आज के दिन की शुरुआत ही खराब हुई है। अस्पताल आने
के लिए वैशाली से ऑटो में चढ़ा। ऑटो में राष्ट्रकवि समीर द्वारा रचित एक महान
रोमांटिक गाने को मुन्ना अजीज और अनुराधा पौडवाल, भांय-भांय गा रहे थे। ड्राईवर
नौजवान था,इसलिए उसकी नजर बार- बार एक किनारे बैठी नायिका की ओर फिसल रही थी।
पट्ठे ने एक मोड़ पर वो धक्का मारा कि सब कुछ टूटते-टूटते बच गया। अस्पताल से लौटा
हूं...सही सलामत।
सोमवार, 15 अक्टूबर 2012
गुरुवार, 27 सितंबर 2012
अपना भाई है रंजीत
रंजीत नाम है इस छोकरे का। पंद्रह - सोलह से ज्यादा की उम्र नहीं होगी । कद अच्छा निकला है लेकिन चेहरे से बचपन की मासूमियत अभी जाने का नाम नहीं ले रही। सड़क के किनारे वो जो चाय की दुकान है ना...हां वहीं जहां भीड़ सी लगी रहती है, रंजीत की है। रंजीत की मां दुकान चलाती है और रंजीत चाय की डिलिवरी करता है। माने ये कि यहां आसपास जितने ऑफिस हैं , वहां ठीक समय पर चाय लेकर पहुंचाता है। चपरासी से लेकर चेयरमैन तक सभी जानते हैं रंजीत को। बड़ा ही प्यारा लड़का है। अपने काम से बड़ा लगाव है रंजीत को। वैसे तो सभी ग्राहकों का ध्यान रखता है, लेकिन सामने ये जो न्यूज चैनल का ऑफिस है ना, उससे रंजीत को बड़ा जुड़ाव है।वहां अंदर जाने के लिए उसे परमिशन की जरुरत नहीं पड़ती। चाय की केतली ली और सीधे घुस गया। सुबह- दोपहर- शाम, तीनों वक्त की चाय। लड़को को भैया कहता है और लड़कियों को मैडम।लेकिन ये सब तो पुरानी बात हो गई। कुछ दिन पहले ये ऑफिस बंद हो गया न। बारी- बारी से सभी चले गए। ऑफिस के सभी लोग जाते हुए रंजीत से मिलकर गए, अपना फोन नंबर दिया, आते रहने का वादा भी किया। जिन्दगी की आपाधापी में कोई रंजीत को देर तक याद रखेगा, ऐसा नहीं लगता। लेकिन रंजीत को सभी याद हैं। पुराने लोग जब कभी पीएफ- तीएफ का काम कराने लोग आते हैं तो रंजीत इसरार करके चाय पिलाता है और पैसे नहीं लेना चाहता। धंधा तो अब भी अच्छा चल रहा है, लेकिन पता नहीं कैसी उदासी इस बच्चे के चेहरे पर आ गई है। कोई कहता है कि न्यूज चैनल में काम करने वाली किसी लड़की से इसे प्यार- व्यार हो गया था। अच्छा, तभी तो दिन भर में ऑफिस के तीन- चार चक्कर लगा लेता था। कोई छेड़ता था तो शरमा जाता था, और मुस्कुरा कर चाय की उबाल देखने लगता था। हूं...ठीक कहते हो... लेकिन कौन थी वो लड़की ? छोड़ो यार, तुम तो पीछे ही पड़ गए।लड़के का पहला प्यार थी, बस इस बात से वास्ता रखो। और इससे कुछ सिखो...पहले प्यार में दिल टूटा लेकिन तुम्हारी तरह देवदास बनकर नहीं बैठ गया।मुस्कुराता रहा, हमें- तुम्हें, सबको चाय पिलाता रहा। तुम होते साले तो शायर हो गए होते अबतक ।पट्ठे को एक दिन हमने छेड़ा तो हमें समझा गया- बोला, भैया हम तो आज भी प्यार करते हैं, वो हमसे बात करती थी, इतना ही बहुत था । समझे बेटा । अब जल्दी से चाय सुड़को और चलो। अबे पैसा तो दे दो चाय का ।" पैसा रहने दो प्रभात भैया...आपने सुना, यहां बगल में ही, तीन मकान छोड़कर, एक नया चैनल खुल रहा है...हां काम चल रहा है...मैं तो देखकर आया हूं...आप न सबको बता दो...जितने भी पुराने लोग हैं, सबकी नौकरी यहां हो जायेगी...फिर सब पहले जैसा हो जायेगा...अच्छा लगेगा, है ना प्रभात भैया ? " ---कौन आयेगा, कौन जायेगा, ये तो पता नहीं बेटा लेकिन हम सबके लिए तुम्हारा प्यार देखकर एक गीत याद आ रहा है, सुनोगे ? --रिश्ता दिल के दिल से ऐतबार का...जिन्दा है हमी से नाम प्यार का...किसी को हो ना हो हमे है ऐतबार...जीना इसी का नाम है। चलो जाता हूं...अबे घर जाकर खाना भी बनाना है। -- "प्रभात भैया मां ने गरम रोटी बनाई है,खालो"।
सोमवार, 14 जून 2010
दुबे जी का जागरण
प्रभात रंजन
पिछली सर्दियों में अनायास दुबे जी से मुलाकात हुई । एक राष्ट्रीय अखबार में दुबे जी पत्रकार हैं और बड़े पद पर हैं । खैर, तब मेरे लिए बेरोजगारी का दौर था और मैं एक पुराने दोस्त से मिलने अखबार के ऑफिस गया था । बात ही बात में पता चला कि अगर दुबे जी प्रसन्न हो गए तो मुझे इस अखबार में नौकरी मिल सकती है । मेरे मित्र ने मुझे बगैर किसी सूचना या सावधानी के दुबे जी के सामने छोड़ दिया। दुबे जी का अद्वितीय पत्रकार व्यक्तित्व मुझे भयक्रांत करने के लिए काफी था । चेहरे पर पनपी हुई समाजवादी खिचड़ी दाढ़ी, सिर पर बेतरतीब बिखरे हुए क्रांतिकारी केश , ऐनक के पीछे से घूरती हुईं एक्सरे जैसी आंखे और पान की पीक से फुलाए अपने पिचके हुए गाल। रीतिकाल के कवि बिहारी होते तो कहते - भले बने हो नाथ । कृशकाय शरीर पर उनके कपड़े पहनने का अंदाज बता रहा था कि दुबे जी को पैंट- शर्ट जैसी आधुनिक पोशाक से कोई लगावट नहीं। खैर, दुबे जी ने मुझे हिकारत से और मैनें दुबे जी को बड़ी हैरत से देखा। दुबे जी ने पूछा- “कहां काम करते थे”
मैनें कहा –' इलेक्ट्रॉनिक में था सर'
दुबे जी मुझे दोबारा ऊपर से नीचे तक देखा । फिर पूछा - “अब अखबार में क्यों”
असली बात छुपाकर मैने कहा – 'सर वहां शोर बहुत है और काम कम'
“लेकिन यहां दाम कम है भाई” – दुख और व्यंग्य को फेटकर दुबे जी ने कहा । कुछ काम और बेकाम के सवाल पूछकर दुबे जी ने मेरे हाथ में एक खबर पकड़ाई और कहा – “बन्धुवर इस खबर पर जरा स्क्रीप्ट लिख दें”
खबर पंजाब के एक गांव की थी- एक गधा अपनी मेहनत से मालिक के खेतों को आबाद करता है और मालिक का परिवार एक साल से बड़ी खुशहाल जिन्दगी गुजार रहा है ।
गधे और उसकी बेचारगी को किसान की चालाकी से जोड़कर मुझ गरीब ने एक स्क्रीप्ट लिख मारी। लेकिन हल खींचते गधे का बिम्ब हास्य से इतना भरपूर था कि भाषा जरा मजाकिया हो गयी । और यही बात दुबे जी को अखर गई।
“अरे ये बड़ा संवेदनशील मुद्दा है भाई...गधे की मेहनत को आप मजाक समझते हैं...आपको इस देश के सिस्टम और सरकार पर लिखना चाहिए...आखिर सरकार की नजर गधों की दुर्दशा पर क्यों नहीं जाती...आपने उसकी कर्मठता पर ध्यान दिए बगैर उसकी दशा पर व्यंग्य लिख दिया है...कमाल करते हैं आप..."
भावावेश में दुबे जी और न जाने क्या बोलते, लेकिन मुंह के पान ने ज्यादा बोलने नहीं दिया । दो-चार बार मुंह दाएं-बाएं हिलाकर दुबे जी ने कहा – "नहीं चलेगा भाई। टीभी ने भाषा- विचार, खबर की समझ , सबका बंटाधार कर दिया है । जाइये भाई अखबार आपके बस का नहीं”-
इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता दुबे जी पान थूकने के लिए उठ गए और फिर देर तक नहीं दिखे। अपनी पढ़ाई - लिखाई को लानत देते हुए मैनें भी अखबार के ऑफिस को प्रणाम किया। साथ ही तीसरी कसम के हीरामन की तरह पहली कसम खायी- आज के बाद किसी भी गधे को लेकर मजाक नहीं करूंगा ।
खैर कुछ दिन पहले दुबे जी से दूसरी बार मुलाकात हो गयी । इसबार एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल में। दुबे जी बड़े ही गर्मजोशी से मिले । मैनें पूछा – सर आप यहां ?
“हां न्यूज हेड से मुलाकात करने आया था...दरअसल एक तरह से इंटरव्यू है...सर ने भरोसा दिया है कि इस बार कुछ करेंगे...लगता है आप भी नौकरी के लिए आएं हैं”- दुबे जी बोले ।
मैने कहा- “मेरी बात जाने दीजिए, आप कैसे टीभी में काम करेंगे...यहां तो खटारा लोग काम करते हैं”
दुबे जी बोले –“आपकी बात ठीक है , लेकिन क्या करें भाई...जरूरत इतनी है और उतने पैसे से काम नहीं चलता...आपकी भाभीजी ने जीना दुभर कर रखा है...समझ लीजिए कि बड़ी दिक्कत है ...और इसमें क्या है...जैसी ठसक के साथ प्रिंट में काम किया,वैसे ही इलेक्ट्रॉनिक को भी हांक ले चलेंगे...बल्कि हमारे जैसे लोगों के आने से आपलोगों की भाषा-वाषा ठीक हो जायेंगी...हें-हें-हें...और रही बात खबर की तो वो दोनों जगह से नदारद है-क्या हिन्दी के अखबार और क्या हिन्दी के चैनल...अब तो कमाना- खाना है”
मैनें मन ही मन दुबे जी प्रणाम किया। उनके जागरण पर शुभकामनाएं दी और मिलते रहने का वादा करके अपनी राह पकड़ी।
पिछली सर्दियों में अनायास दुबे जी से मुलाकात हुई । एक राष्ट्रीय अखबार में दुबे जी पत्रकार हैं और बड़े पद पर हैं । खैर, तब मेरे लिए बेरोजगारी का दौर था और मैं एक पुराने दोस्त से मिलने अखबार के ऑफिस गया था । बात ही बात में पता चला कि अगर दुबे जी प्रसन्न हो गए तो मुझे इस अखबार में नौकरी मिल सकती है । मेरे मित्र ने मुझे बगैर किसी सूचना या सावधानी के दुबे जी के सामने छोड़ दिया। दुबे जी का अद्वितीय पत्रकार व्यक्तित्व मुझे भयक्रांत करने के लिए काफी था । चेहरे पर पनपी हुई समाजवादी खिचड़ी दाढ़ी, सिर पर बेतरतीब बिखरे हुए क्रांतिकारी केश , ऐनक के पीछे से घूरती हुईं एक्सरे जैसी आंखे और पान की पीक से फुलाए अपने पिचके हुए गाल। रीतिकाल के कवि बिहारी होते तो कहते - भले बने हो नाथ । कृशकाय शरीर पर उनके कपड़े पहनने का अंदाज बता रहा था कि दुबे जी को पैंट- शर्ट जैसी आधुनिक पोशाक से कोई लगावट नहीं। खैर, दुबे जी ने मुझे हिकारत से और मैनें दुबे जी को बड़ी हैरत से देखा। दुबे जी ने पूछा- “कहां काम करते थे”
मैनें कहा –' इलेक्ट्रॉनिक में था सर'
दुबे जी मुझे दोबारा ऊपर से नीचे तक देखा । फिर पूछा - “अब अखबार में क्यों”
असली बात छुपाकर मैने कहा – 'सर वहां शोर बहुत है और काम कम'
“लेकिन यहां दाम कम है भाई” – दुख और व्यंग्य को फेटकर दुबे जी ने कहा । कुछ काम और बेकाम के सवाल पूछकर दुबे जी ने मेरे हाथ में एक खबर पकड़ाई और कहा – “बन्धुवर इस खबर पर जरा स्क्रीप्ट लिख दें”
खबर पंजाब के एक गांव की थी- एक गधा अपनी मेहनत से मालिक के खेतों को आबाद करता है और मालिक का परिवार एक साल से बड़ी खुशहाल जिन्दगी गुजार रहा है ।
गधे और उसकी बेचारगी को किसान की चालाकी से जोड़कर मुझ गरीब ने एक स्क्रीप्ट लिख मारी। लेकिन हल खींचते गधे का बिम्ब हास्य से इतना भरपूर था कि भाषा जरा मजाकिया हो गयी । और यही बात दुबे जी को अखर गई।
“अरे ये बड़ा संवेदनशील मुद्दा है भाई...गधे की मेहनत को आप मजाक समझते हैं...आपको इस देश के सिस्टम और सरकार पर लिखना चाहिए...आखिर सरकार की नजर गधों की दुर्दशा पर क्यों नहीं जाती...आपने उसकी कर्मठता पर ध्यान दिए बगैर उसकी दशा पर व्यंग्य लिख दिया है...कमाल करते हैं आप..."
भावावेश में दुबे जी और न जाने क्या बोलते, लेकिन मुंह के पान ने ज्यादा बोलने नहीं दिया । दो-चार बार मुंह दाएं-बाएं हिलाकर दुबे जी ने कहा – "नहीं चलेगा भाई। टीभी ने भाषा- विचार, खबर की समझ , सबका बंटाधार कर दिया है । जाइये भाई अखबार आपके बस का नहीं”-
इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता दुबे जी पान थूकने के लिए उठ गए और फिर देर तक नहीं दिखे। अपनी पढ़ाई - लिखाई को लानत देते हुए मैनें भी अखबार के ऑफिस को प्रणाम किया। साथ ही तीसरी कसम के हीरामन की तरह पहली कसम खायी- आज के बाद किसी भी गधे को लेकर मजाक नहीं करूंगा ।
खैर कुछ दिन पहले दुबे जी से दूसरी बार मुलाकात हो गयी । इसबार एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल में। दुबे जी बड़े ही गर्मजोशी से मिले । मैनें पूछा – सर आप यहां ?
“हां न्यूज हेड से मुलाकात करने आया था...दरअसल एक तरह से इंटरव्यू है...सर ने भरोसा दिया है कि इस बार कुछ करेंगे...लगता है आप भी नौकरी के लिए आएं हैं”- दुबे जी बोले ।
मैने कहा- “मेरी बात जाने दीजिए, आप कैसे टीभी में काम करेंगे...यहां तो खटारा लोग काम करते हैं”
दुबे जी बोले –“आपकी बात ठीक है , लेकिन क्या करें भाई...जरूरत इतनी है और उतने पैसे से काम नहीं चलता...आपकी भाभीजी ने जीना दुभर कर रखा है...समझ लीजिए कि बड़ी दिक्कत है ...और इसमें क्या है...जैसी ठसक के साथ प्रिंट में काम किया,वैसे ही इलेक्ट्रॉनिक को भी हांक ले चलेंगे...बल्कि हमारे जैसे लोगों के आने से आपलोगों की भाषा-वाषा ठीक हो जायेंगी...हें-हें-हें...और रही बात खबर की तो वो दोनों जगह से नदारद है-क्या हिन्दी के अखबार और क्या हिन्दी के चैनल...अब तो कमाना- खाना है”
मैनें मन ही मन दुबे जी प्रणाम किया। उनके जागरण पर शुभकामनाएं दी और मिलते रहने का वादा करके अपनी राह पकड़ी।
बुधवार, 19 मई 2010
पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?
जैसा कि हम जानते हैं, हमारे देश में गृह-मंत्रालय भी है। मंत्रालय है तो मंत्री हैं।
मंत्री काबिल हैं और कमाल के हैं लेकिन परेशान हैं । उनकी बात किसी के समझ में नहीं आती। आम आदमी तो खैर उनकी जबान क्या समझेगा, चिदंबरम भद्र राजनेताओं के भी पल्ले नहीं पड़ते। इधर राजनीति में जुमलेबाजी का दौर है । एक जुमला चिदंबरम पहले ही मार चुके हैं – बक स्टॉप विद...। अब कहते हैं कि उनके पास नक्सलवाद से लड़ने के लिए पर्याप्त मैंडेट नहीं है । जाहिर है एक बार फिर आम आदमी के समझ में ये मुहावरा भी नहीं आने वाला है। लेकिन अरुण जेटली ने फटाफट समझ लिया। समझ लिया इसलिए देर न करते हुए, चिदंबरम पर एक जबरदस्त जुमले से वार किया । घायल शहीद। चिदंबरम चारो खाने चित्त । कहते रहे कि इन शब्दों का चयन बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है । अब गृहमंत्री को कौन समझाये कि बक स्टॉप विद चीफ मिनिस्टर वाला जुमला भी दुर्भाग्यपूर्ण था । देखा जाए तो सारा दोष भाषा और मुहावरों का है । कुछ दिन पहले जब शशी थरूर ने कैटल क्लास वाला जुमला इस्तेमाल किया था तो कढ़ी में उबाल आ गया था ( क्या मुहावरा है )। इधर संसद में मणिशंकर ने जुमले के तौर पर जेटली को जब फासिस्ट कहा तो राज्यसभा में बवाल हो गया । ये तो फिर भी अंग्रेजी के जुमले हैं, ज्यादातर लोगों के अर्थ समझते समझते असर खो देते हैं । हिन्दी के मुहावरों का क्या असर होता है , ये कोई लालू और मुलायम से पूछे । गडकरी ने मातृभाषा के एक मुहावरे में दोनों को कुत्ते की तरह तलवे चाटने वाला कहा । हंगामा होना ही था ,और खुब हुआ। कुत्ते का जातीय चरित्र ही ऐसा है, वरना किसी को शेर कहने पर वो कतई बुरा न
हीं मानता । मुहावरे में शेर को जानवर नहीं मानते, लेकिन कुत्ता फिर भी कुत्ता ही बना रहता है। बेचारा । फिलहाल देश की राजनीति ऐसे ही जुमलों के सहारे चलती लगती है । गृहमंत्री शायद नक्सलियों के खिलाफ एयर फोर्स के बारे में सोच रहे हैं लेकिन दिग्विजय सिंह इस बात से घोर असहमत हैं । दिग्गी राजा फरमाते हैं कि सुरक्षा बलों को उतारने के लिए हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन एयर फोर्स का नहीं । ये जुमला नहीं है और राजनीति भी नहीं इसलिए हमारे किसी काम की नहीं । जुमला तो कांग्रेस के केशव राव ने मारा है--नक्सलियों के मामलें में पहले विकास फिर बात और आखिर में कार्रवाई । सर जी जुमला तो बड़ा जबरदस्त है लेकिन काफी पुराना है। गृहमंत्री के ग्रीन हंट जुमले की टक्कर में कहीं नहीं टिकता । खैर संजीदा मसलों पर नेताओं की जुमलेबाजी तो हम देख सुन रहे हैं, लेकिन अहम सवाल अपनी जगह है। मुक्तिबोध की शैली में हमें भी पूछना है , पार्टनर मुहावरे को जाने दो तेल लेने तुम बताओ तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?
मंत्री काबिल हैं और कमाल के हैं लेकिन परेशान हैं । उनकी बात किसी के समझ में नहीं आती। आम आदमी तो खैर उनकी जबान क्या समझेगा, चिदंबरम भद्र राजनेताओं के भी पल्ले नहीं पड़ते। इधर राजनीति में जुमलेबाजी का दौर है । एक जुमला चिदंबरम पहले ही मार चुके हैं – बक स्टॉप विद...। अब कहते हैं कि उनके पास नक्सलवाद से लड़ने के लिए पर्याप्त मैंडेट नहीं है । जाहिर है एक बार फिर आम आदमी के समझ में ये मुहावरा भी नहीं आने वाला है। लेकिन अरुण जेटली ने फटाफट समझ लिया। समझ लिया इसलिए देर न करते हुए, चिदंबरम पर एक जबरदस्त जुमले से वार किया । घायल शहीद। चिदंबरम चारो खाने चित्त । कहते रहे कि इन शब्दों का चयन बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है । अब गृहमंत्री को कौन समझाये कि बक स्टॉप विद चीफ मिनिस्टर वाला जुमला भी दुर्भाग्यपूर्ण था । देखा जाए तो सारा दोष भाषा और मुहावरों का है । कुछ दिन पहले जब शशी थरूर ने कैटल क्लास वाला जुमला इस्तेमाल किया था तो कढ़ी में उबाल आ गया था ( क्या मुहावरा है )। इधर संसद में मणिशंकर ने जुमले के तौर पर जेटली को जब फासिस्ट कहा तो राज्यसभा में बवाल हो गया । ये तो फिर भी अंग्रेजी के जुमले हैं, ज्यादातर लोगों के अर्थ समझते समझते असर खो देते हैं । हिन्दी के मुहावरों का क्या असर होता है , ये कोई लालू और मुलायम से पूछे । गडकरी ने मातृभाषा के एक मुहावरे में दोनों को कुत्ते की तरह तलवे चाटने वाला कहा । हंगामा होना ही था ,और खुब हुआ। कुत्ते का जातीय चरित्र ही ऐसा है, वरना किसी को शेर कहने पर वो कतई बुरा न
हीं मानता । मुहावरे में शेर को जानवर नहीं मानते, लेकिन कुत्ता फिर भी कुत्ता ही बना रहता है। बेचारा । फिलहाल देश की राजनीति ऐसे ही जुमलों के सहारे चलती लगती है । गृहमंत्री शायद नक्सलियों के खिलाफ एयर फोर्स के बारे में सोच रहे हैं लेकिन दिग्विजय सिंह इस बात से घोर असहमत हैं । दिग्गी राजा फरमाते हैं कि सुरक्षा बलों को उतारने के लिए हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन एयर फोर्स का नहीं । ये जुमला नहीं है और राजनीति भी नहीं इसलिए हमारे किसी काम की नहीं । जुमला तो कांग्रेस के केशव राव ने मारा है--नक्सलियों के मामलें में पहले विकास फिर बात और आखिर में कार्रवाई । सर जी जुमला तो बड़ा जबरदस्त है लेकिन काफी पुराना है। गृहमंत्री के ग्रीन हंट जुमले की टक्कर में कहीं नहीं टिकता । खैर संजीदा मसलों पर नेताओं की जुमलेबाजी तो हम देख सुन रहे हैं, लेकिन अहम सवाल अपनी जगह है। मुक्तिबोध की शैली में हमें भी पूछना है , पार्टनर मुहावरे को जाने दो तेल लेने तुम बताओ तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?शुक्रवार, 14 मई 2010
जलेबी का समाजवाद
मेरे जीवन में एक ऐसा वक्त आ गया है
जब खोने को
कुछ भी नहीं है मेरे पास
दिन, दोस्ती, रवैया
राजनीति
गपशप, घास
और स्त्री हालॉकि वह बैठी हुई है
मेरे पास... ( श्रीकांत वर्मा )
...मैं भी कह सकता हूं यह बात । अव्वल तो कई चीजे कभी हासिल नहीं हुई। कुछ मिलने के बाद खो गईं । फिर भी, जो शेष है उससे आसक्त नहीं हूं । सिवाय जलेबी के । जलेबी के साथ रोमांस बचपन में शुरू हुआ । जवानी तक चला आया है । मां मीठा कम खाने की हिदायत देती रहती हैं, लेकिन कमबख्त जलेबी से नजर आज भी नहीं चुरा पाता । हफ्ते में कम से कम दो बार चख लेता हूं । दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में जहां रहता हूं , वही गली के मोड़ पर जलेबी की एक दुकान है । माफ कीजिए , मुझे सच बोलना चाहिए । एक जलेबी बनाने वाले का ठेला है । दिन ढ़लने से पहले यूपी के गोरखपूर का रहने वाला श्याम अपनी दुकान ( ठेला ) सजा लेता है । मैदा के घोल वाले बड़े कनस्तर, एक कम गहराई वाली कड़ाही, चिमटे – चुल्हा और एक छोटू । काम की तलाश में गांव से श्याम के साथ ही चला आया है छोटू । दुकान लगने की देर भर होती है कि देखते- देखते ग्राहक ठेले पर टूट पड़ते हैं । ग्राहक यानि मुखर्जी नगर में रहने वाले प्रवासी छात्र और छात्राएं— इनमें से कई कल के बड़े आईएएस अधिकारी हैं । दुकान पर विधार्थियों की तादाद ज्यादा होती है क्योंकि आर्थिक पैमाने पर जलेबी उनकी जेब को भी पसंद आती है । पांच रुपए की जलेबी में स्वाद भी आ जाता है, शाम भी कट जाती है । एक तबका और है रिक्शा चालकों का और आसपास मजदुरी करने वालों का । दिन भर की मेहनत के बाद सुस्ताने के नाम पर ठंढा पानी पीने के लिए , मीठी जलेबी बड़ी कारगर होती है । रस में डूबी हुईं, गरम-गरम करारी जलेबियां जो सुख देती है , उसे थके हुए चेहरों पर देखा जा सकता है, बयान नहीं किया जा सकता । इस तरह महानगर में आए दूर कस्बे - देहात के नौजवान हों या मजदुर , जलेबी दोनो को बेहद पसंद है । श्याम के ठेले पर कार से उतर कर जलेबी लेने वाले भी अच्छी तादाद में आते हैं और मम्मियों का हाथ पकड़े छोटे बच्चे भी । सभी एक दुसरे के बगल में खड़े होकर मजे से जलेबियां खाते हैं। पढ़ी लिखी नौजवान पीढ़ी को किसी रिक्शेवाले के बगल में खड़ा होकर जलेबी खाने में कोई गुरेज नहीं होता । कार वालों को मजदुरों से घिन नहीं आती। । देश की सबसे सस्ती मिठाई, अपनी चासनी में सबको एक साथ डूबा लेती है । महानगर में गली- गली मिठाई की ब्रांड दुकाने हैं ,लेकिन क्या ऐसा नजारा वहां मुमकिन है? अगर देखा जाए तो मुखर्जी नगर ही क्यों , कहीं भी जलेबी का ठेला समाजवाद का अनोखा प्रतीक है । एक स्वाद जो सबके लिए है और सबको मयस्सर है ।
और आखिर में फैज साहब का एक शेर –
आस उस दर से टूटती नहीं
जाके देखा,न जाके देख लिया
जब खोने को
कुछ भी नहीं है मेरे पास
दिन, दोस्ती, रवैया
राजनीति
गपशप, घास
और स्त्री हालॉकि वह बैठी हुई है
मेरे पास... ( श्रीकांत वर्मा )
...मैं भी कह सकता हूं यह बात । अव्वल तो कई चीजे कभी हासिल नहीं हुई। कुछ मिलने के बाद खो गईं । फिर भी, जो शेष है उससे आसक्त नहीं हूं । सिवाय जलेबी के । जलेबी के साथ रोमांस बचपन में शुरू हुआ । जवानी तक चला आया है । मां मीठा कम खाने की हिदायत देती रहती हैं, लेकिन कमबख्त जलेबी से नजर आज भी नहीं चुरा पाता । हफ्ते में कम से कम दो बार चख लेता हूं । दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में जहां रहता हूं , वही गली के मोड़ पर जलेबी की एक दुकान है । माफ कीजिए , मुझे सच बोलना चाहिए । एक जलेबी बनाने वाले का ठेला है । दिन ढ़लने से पहले यूपी के गोरखपूर का रहने वाला श्याम अपनी दुकान ( ठेला ) सजा लेता है । मैदा के घोल वाले बड़े कनस्तर, एक कम गहराई वाली कड़ाही, चिमटे – चुल्हा और एक छोटू । काम की तलाश में गांव से श्याम के साथ ही चला आया है छोटू । दुकान लगने की देर भर होती है कि देखते- देखते ग्राहक ठेले पर टूट पड़ते हैं । ग्राहक यानि मुखर्जी नगर में रहने वाले प्रवासी छात्र और छात्राएं— इनमें से कई कल के बड़े आईएएस अधिकारी हैं । दुकान पर विधार्थियों की तादाद ज्यादा होती है क्योंकि आर्थिक पैमाने पर जलेबी उनकी जेब को भी पसंद आती है । पांच रुपए की जलेबी में स्वाद भी आ जाता है, शाम भी कट जाती है । एक तबका और है रिक्शा चालकों का और आसपास मजदुरी करने वालों का । दिन भर की मेहनत के बाद सुस्ताने के नाम पर ठंढा पानी पीने के लिए , मीठी जलेबी बड़ी कारगर होती है । रस में डूबी हुईं, गरम-गरम करारी जलेबियां जो सुख देती है , उसे थके हुए चेहरों पर देखा जा सकता है, बयान नहीं किया जा सकता । इस तरह महानगर में आए दूर कस्बे - देहात के नौजवान हों या मजदुर , जलेबी दोनो को बेहद पसंद है । श्याम के ठेले पर कार से उतर कर जलेबी लेने वाले भी अच्छी तादाद में आते हैं और मम्मियों का हाथ पकड़े छोटे बच्चे भी । सभी एक दुसरे के बगल में खड़े होकर मजे से जलेबियां खाते हैं। पढ़ी लिखी नौजवान पीढ़ी को किसी रिक्शेवाले के बगल में खड़ा होकर जलेबी खाने में कोई गुरेज नहीं होता । कार वालों को मजदुरों से घिन नहीं आती। । देश की सबसे सस्ती मिठाई, अपनी चासनी में सबको एक साथ डूबा लेती है । महानगर में गली- गली मिठाई की ब्रांड दुकाने हैं ,लेकिन क्या ऐसा नजारा वहां मुमकिन है? अगर देखा जाए तो मुखर्जी नगर ही क्यों , कहीं भी जलेबी का ठेला समाजवाद का अनोखा प्रतीक है । एक स्वाद जो सबके लिए है और सबको मयस्सर है ।
और आखिर में फैज साहब का एक शेर –
आस उस दर से टूटती नहीं
जाके देखा,न जाके देख लिया
गुरुवार, 6 मई 2010
धंधे का मास्टर स्ट्रोक
प्रभात रंजन
गरीबी का अपना एक अलग सौन्दर्य होता है- ऐसा सुना है । आजकल देख रहा हूं । सौन्दर्य भी ऐसा कि कलेजा मुंह को आता है और हाथ हड़बड़ाहट में कलेजे तक जाता है। पूरा मोहल्ला उसे देखने की बाट जोहता रहता है। दिख जाए तो आफत ना दिखे तो आफत । बस यूं समझें कि "कमबख्त दिल को चैन नहीं है किसी तरह" - जैसी पोज में मोहल्ला पलक- पावड़े बिछाए रहता है ।
अब आगे की कहानी फ्लैश बैक में.....
महीने भर पहले हमारी गली के आखिरी मकान के आगे, कपड़े आयरन करने की एक दुकान खुली।मोहल्ले में पहले से एक दुकान थी । इकलौती दुकान धड़ल्ले से चलती थी। नई दुकान खुलने का बाद भी पुरानी पर कोई असर नहीं पड़ा क्योंकि लोगों को उसकी आदत पड़ चुकी थी । कपड़े धुलते रहे
, पुरानी दुकान पर आयरन होते रहे और नई दुकान पर मक्खियां उड़ती रहीं । कई दिनों तक । लेकिन बेहद गर्मी के बाद जैसे बारिश के आने से मौसम बदल जाता है , हमारे मोहल्ले की फिजा भी बदली । एक दिन सुबह – सुबह ही कुछ जगे कुछ सोये लोगों की कान में एक मधुर आवाज पड़ी। आयरन के लिए कपड़े दे दो भैया....बाऊजी...अम्मा...भाभी...कपड़े दे दो । मोहल्ला एक झटके से निंद से जागा । आंखे खोलकर उसे देखा और बस देखता रह गया । कमर कुछ ज्यादा ही मटकाते और एड़ियों से धूप उड़ाते, उसने पल भर में पूरे मोहल्ले का मुआयना कर लिया। नई भाभियों के दिल में तलवार की तरह धंसी तो पुराने भाईयों के दिल में उतर गई । तुरंत ही पता चल गया कि मोहतरमा आयरन करने वाली नई दुकान की मालकिन हैं । और ये भी कि आइन्दा दुकान इनकी देख रेख में ही चलेगी । इस सूचना को मोहल्ले ने खुले दिल से स्वीकार किया । कपड़ो के गठ्ठर ने अपना रास्ता बदल लिया। मैडम की तिरछी नजर जिस पर भी पड़ी- भाई, अंकल या बाऊजी -वो उनका स्थायी कंज्यूमर हो गया। अब धुले कपड़ो के लेन देन में अदाओं का कारोबार चलता है । नई दुकान खूब चलती है। पुरानी शायद जल्दी ही बंद हो जाएगी। कहना होगा कि बिजनेस का ये मास्टर स्ट्रोक है , जिसका इस्तेमाल अभी तक बहुराष्ट्रीय कंपनियां और बड़ी दुकान वाले करते थे। छोटे कारोबारियों को भी इसकी समझ हो रही है । बहरहाल तमाशा है , मजा लीजिए। अचानक ,बेवजह कुछ भी नहीं होता ( अचानक सिर्फ फूल खिलते हैं और बेवजह सिर्फ गधे दुलत्ती मारते हैं )। मुद्दे की बात - धंधे के लिए मार्केटिंग की समझ हो तो नई दुकान भी झट से चल पड़ती है । और जैसा कि चचा गालिब भी कह गए हैं, शाह का मुसाहिब होना खराब बात नहीं होती। ये कला आती हो तो आपका खोटा सिक्का भी खन- खन करता है ।
गरीबी का अपना एक अलग सौन्दर्य होता है- ऐसा सुना है । आजकल देख रहा हूं । सौन्दर्य भी ऐसा कि कलेजा मुंह को आता है और हाथ हड़बड़ाहट में कलेजे तक जाता है। पूरा मोहल्ला उसे देखने की बाट जोहता रहता है। दिख जाए तो आफत ना दिखे तो आफत । बस यूं समझें कि "कमबख्त दिल को चैन नहीं है किसी तरह" - जैसी पोज में मोहल्ला पलक- पावड़े बिछाए रहता है ।
अब आगे की कहानी फ्लैश बैक में.....
महीने भर पहले हमारी गली के आखिरी मकान के आगे, कपड़े आयरन करने की एक दुकान खुली।मोहल्ले में पहले से एक दुकान थी । इकलौती दुकान धड़ल्ले से चलती थी। नई दुकान खुलने का बाद भी पुरानी पर कोई असर नहीं पड़ा क्योंकि लोगों को उसकी आदत पड़ चुकी थी । कपड़े धुलते रहे
, पुरानी दुकान पर आयरन होते रहे और नई दुकान पर मक्खियां उड़ती रहीं । कई दिनों तक । लेकिन बेहद गर्मी के बाद जैसे बारिश के आने से मौसम बदल जाता है , हमारे मोहल्ले की फिजा भी बदली । एक दिन सुबह – सुबह ही कुछ जगे कुछ सोये लोगों की कान में एक मधुर आवाज पड़ी। आयरन के लिए कपड़े दे दो भैया....बाऊजी...अम्मा...भाभी...कपड़े दे दो । मोहल्ला एक झटके से निंद से जागा । आंखे खोलकर उसे देखा और बस देखता रह गया । कमर कुछ ज्यादा ही मटकाते और एड़ियों से धूप उड़ाते, उसने पल भर में पूरे मोहल्ले का मुआयना कर लिया। नई भाभियों के दिल में तलवार की तरह धंसी तो पुराने भाईयों के दिल में उतर गई । तुरंत ही पता चल गया कि मोहतरमा आयरन करने वाली नई दुकान की मालकिन हैं । और ये भी कि आइन्दा दुकान इनकी देख रेख में ही चलेगी । इस सूचना को मोहल्ले ने खुले दिल से स्वीकार किया । कपड़ो के गठ्ठर ने अपना रास्ता बदल लिया। मैडम की तिरछी नजर जिस पर भी पड़ी- भाई, अंकल या बाऊजी -वो उनका स्थायी कंज्यूमर हो गया। अब धुले कपड़ो के लेन देन में अदाओं का कारोबार चलता है । नई दुकान खूब चलती है। पुरानी शायद जल्दी ही बंद हो जाएगी। कहना होगा कि बिजनेस का ये मास्टर स्ट्रोक है , जिसका इस्तेमाल अभी तक बहुराष्ट्रीय कंपनियां और बड़ी दुकान वाले करते थे। छोटे कारोबारियों को भी इसकी समझ हो रही है । बहरहाल तमाशा है , मजा लीजिए। अचानक ,बेवजह कुछ भी नहीं होता ( अचानक सिर्फ फूल खिलते हैं और बेवजह सिर्फ गधे दुलत्ती मारते हैं )। मुद्दे की बात - धंधे के लिए मार्केटिंग की समझ हो तो नई दुकान भी झट से चल पड़ती है । और जैसा कि चचा गालिब भी कह गए हैं, शाह का मुसाहिब होना खराब बात नहीं होती। ये कला आती हो तो आपका खोटा सिक्का भी खन- खन करता है । सोमवार, 26 अप्रैल 2010
तुझमें कोई कमी नहीं पाते
फिराक गोरखपुरी की गजल
बन्दगी से कभी नहीं मिलती
इस तरह ज़िन्दगी नहीं मिलती
लेने से ताज़ो-तख़्त मिलता है
मांगे से भीख भी नहीं मिलती
एक दुनिया है मेरी नज़रों में
पर वो दुनिया अभी नहीं मिलती
जब तक ऊँची न हो जमीर की लौ
आँख को रौशनी नहीं मिलती
तुझमें कोई कमी नहीं पाते
तुझमें कोई कमी नहीं मिलती
यूँ तो मिलने को मिल गया है ख़ुदा
पर तेरी दोस्ती नहीं मिलती
बस वो भरपूर जिन्दगी है ’फ़िराक़’
जिसमें आसूदगी नहीं मिलती
बन्दगी से कभी नहीं मिलती
इस तरह ज़िन्दगी नहीं मिलती
लेने से ताज़ो-तख़्त मिलता है
मांगे से भीख भी नहीं मिलती
एक दुनिया है मेरी नज़रों में
पर वो दुनिया अभी नहीं मिलती
जब तक ऊँची न हो जमीर की लौ
आँख को रौशनी नहीं मिलती
तुझमें कोई कमी नहीं पाते
तुझमें कोई कमी नहीं मिलती
यूँ तो मिलने को मिल गया है ख़ुदा
पर तेरी दोस्ती नहीं मिलती
बस वो भरपूर जिन्दगी है ’फ़िराक़’
जिसमें आसूदगी नहीं मिलती
बुधवार, 21 अप्रैल 2010
उफ ये तेरी हठधर्मिता
आजकल विनोद जी को पढ़ रहा हूं । खिलेगा तो देखेंगे । मौजूदा दौर में अपनी भाषा की ताकत का एक उदाहरण राग दरबारी है।अरूण कमल जी की पंक्तियां याद आ रही है कि भाषा की सभी हड्डियां चटका के शुक्ल जी ने रागदरबारी की भाषा का ईजाद किया है । यकीनन रागदरबारी अपनी भाषायी उपलब्धियों में बेजोड़ है। लेकिन विनोद जी के यहां मुहावरे पर जोर नहीं है,जोर है बिम्ब पर । गध में कविता जैसे बिम्बों की रचना विनोद जी की अपनी खासियत है । इससे पहले 'दीवार में खिड़की'को पढ़ते हुए भी अपनी भाषा की अनदेखी खूबसूरती मुग्ध कर गई थी। विनोद जी निश्चित रूप से प्रेमचंद की उस परंपरा के हिस्से हैं जिसमें सीधी- सादी सरल भाषा के माध्यम से जादू जगाने का काम किया जाता है । तत्सम और सामासिक शब्दों के बजाय ठेठ गंवारी बोली से सृजनात्मकता कैसे होती है , ये नागार्जुन के यहां भी देखा जा सकता है और त्रिलोचन के यहां भी। नामवर सिंह की एक बात याद आती है कि जनकवियों की कविताएं देखने में बड़ी सहज और आसान लगती है लेकिन अगर लिखने चलिए तो आटे दाल का भाव पता चल जाता है । खैर भाषा को लेकर बात इसलिए छेड़ी है कि, मैं जिस पेशे में हूं वहां भी भाषा को लेकर बड़े बवाल हैं । हुआ यूं कि कल एक स्क्रीप्ट पर नजर पड़ी जिसमें 'हठधर्मिता' जैसे शब्दों का सयास इस्तेमाल किया गया था । बाद में पता चला कि लिखने वाले सज्जन अब तक प्रिंट मीडिया से ताल्लुक रखते थे और अभी अभी इलेक्ट्रानिक मीडिया की गलीज दूनिया में कदम रखा है । बड़े पद पर हैं और रसूख रखते हैं । मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर उनका, उनकी हठधर्मिता की ओर ध्यान दिलाया जाए तो उनका कहर टीवी की वाहियात भाषा पर टूट पड़ेगा । शायद कह दें कि हम टीवी वालों को भाषा आती ही नहीं । असल, सवाल ये है कि प्रिंट में भी ऐसे शब्दों के इस्तेमाल का क्या तुक है जबकि पत्रकारिता के ककहरे में ये बात समझाई जाती है कि भाषा आसान और पंक्तियां छोटी होनी चाहिए । देश के सभी बड़े पत्रकार , चाहे प्रिंट के हो या टीवी के , सहज-सरल भाषा का ही इस्तेमाल करते हैं । संप्रेषण में सुविधा होती है । और जहां तक बात है विद्वान टाइप लोगों की तो , मैं फिर से नामवर जी की पंक्तियां दुहराना चाहूंगा कि पहले आसान भाषा में लिख कर दिखाइए- आटे दाल का भाव पता चल जायेगा । एक बात और , अच्छा लिखने के नाम पर तत्सम शब्द और संयुक्त वाक्यों का इस्तेमाल करने वाले लोगो की जमात अकेली नहीं है । एक और जमात है , खासकर के टीवी की दूनिया में, जो सयास उर्दू के कठिन अल्फाजों का इस्तेमाल करती है । इनका भी मानना है कि फकत उर्दू के इस्तेमाल से स्क्रीप्ट जबरदस्त हो जाती है । भले ही उसके मायने न लिखने वाले के समझ में आए और ना सुनने वाले के । भाई लोग साठ सत्तर की हिन्दी फिल्मों की तरह उर्दू को टीवी के लिए बड़ी जरूरी चीज समझते हैं । और लिखते जा रहे हैं । दोनो जमातों को नसीहत देने का मेरा कोई इरादा नहीं ।आसान भाषा में गंभीर बात कहने की ,या कह सकने की कला अगर वाकई सिखनी हो तो हरिशंकर परसाई को पढने की नसीहत जरूर दूंगा ।
मंगलवार, 20 अप्रैल 2010
तेरा जाना दिल के अरमानों का लूट जाना
भैया जी का इरादा खराब नहीं था । बस बात इतनी है कि निशाने पर आ गए । राजनीति के शिवपालगंज में थरूर भैया की एंट्री रंगनाथ की तरह हुई । तौर तरीकों में विदेशी थरूर भैया देसी माहौल में खप पाते , इससे पहले ही खपा दिए गए । क्या करें, इतने कम दिनों में गंजहापन सिखना भी आसान नहीं था । खैर ये बात तो सरेआम खुद थरूर साहब ने भी मानी है कि राजनीति में नौसिखुआ होने का खामियाजा उन्हे भुगतना पड़ा है । लेकिन भैया जी ने गलतियां भी कम नहीं की । कैटल क्लास के बवाल पर ‘बाल बाल बचे’ की चेतावनी को थरूर ने गंभीरता से लिया नहीं । और विदेश मंत्रालय की फाइलें निपटाते निपटाते क्रिकेट में उलझ गए । आईपीएल की कोच्चि टीम से थरूर का लगाव जायज है और किसी को इस पर भला क्या ऐतराज हो सकता है । शरद पवार या अरूण जेटली पर तो कभी किचड़ नहीं उछला । शिवपालगंज में ऐसे मामलों पर कोई ध्यान देता भी नहीं । दिक्कत तब हुई जब थरूर ने राजनीति और क्रिकेट के असली संबंधों को समझे बगैर गलत शॉट लगा दिया । आईपीएल के गोरखधंधे में जरूरत डेलीकेट कवर ड्राइव की थी और आपने सीधे सहवाग के अंदाज में लांग ऑन पर छक्का मार दिया । अब क्या था, बौखला गए मोदी साहब । दूसरी गलती , शिवपालगंज की राजनीति में सब कुछ माफ है लेकिन जब किसी गैर राजनीतिक सुंदर महिला की एंट्री होती है तो बवाल होना तय है । थरूर के चाहने भर से शिवपालगंज की हिप्पोक्रेसी रातों - रात तो दूर नहीं हो सकती । इसलिए नहीं हुई और अति आत्मविश्ववास के कारण थरूर भैया नप गए ।सच पूछिए तो, भैया जी आपसे बड़ी उम्मीदें थी। आपकी अंग्रेजी और आकर्षक व्यक्तित्व, देश के बड़े काम आ सकता था । मैडम का भी यही मानना था । लेकिन क्या करें ,हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले । कांग्रेस के शनिचरों को आकलन आपने ठीक से नहीं किया और नतीजा...बड़े बेआबरू होकर कूचे से हम निकले । अब फुर्सत है , आराम से टिवटर पर देश विदेश के तरक्की पसंद लोगों से गूफ्तगू कीजिए । शुभकामनाएं
गुरुवार, 15 अप्रैल 2010
सानिया और संगीता
सानिया मिर्जा की शादी में देश और खासतौर पर मीडिया ने बड़ी रूचि दिखाई । रोने गाने वाले अपनी- अपनी कला की नुमाईश करते नजर आए। बहरहाल शादी हो गई और देश की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा । ऐसा लगता था कि सानिया की शादी के बाद देश पर भारी आपत्ति आने वाली है। देश की शान, सानिया जब पाकिस्तान की नूरे नजर हो जाएंगी तो भारतवासियों की गर्दन को हमेशा के लिए लकवा मार जायेगा । लटकी रह जायेगी बेचारी । कहने वाले तो सानिया की बिदाई को कोहेनूर हीरे की जुदाई से जोड़ कर देख रहे थे । और इसीलिए जार जार टेसू बहा रहे थे । बहरहाल तमाशा नहीं हुआ और बड़े आराम से सानिया के हाथों पर मेंहदी सजी और वो दुल्हन भी बन गईं ।बहरहाल सानिया को देश की ओर से एक बड़ा ही हसीन तोहफा मिला है। उज्जैन के एक दंपत्ति ने कुछ साल पहले सानिया की उपलब्धियों से प्रभावित होकर अपनी बेटी का नाम सानिया रखा। अब उन्होने इसका नाम बदलकर संगीता रख दिया है । इस तरह सानिया अब संगीता हो गई है । जी, हमारी अपनी सानिया शादी के बाद हमारे लिए इस हद तक परायी हो गयी कि अब उसका नाम भी गंवारा नहीं । बात बड़ी साफ है । राष्ट्रवाद की कच्ची समझ के कारण उज्जैन के इस दंपत्ति को सानिया से अचानक नफरत हो गई । वैसे संगीता अगर सानिया ही रहती तो क्या फर्क पड़ता । अपने खेल से देश को सम्मान दिलाने वाली सानिया हमें टेनिस की वजह से ही अजीज है । वैसे ही जैसे किसी दौर में स्टेफी ग्राफ या अब विलियम्स बहने हैं । स्टेफी शादी के बाद अगर अमेरिका चलीं गयीं तो क्या ये तकलीफ किसी जर्मन को हुई होगी । खेल और राष्ट्रवाद का रिश्ता तो फिर भी समझ में आता है लेकिन किसी खिलाड़ी की निजी जिन्दगी को राष्ट्रीय धरोहर मान लेना क्या ठीक है । खैर इस मुद्दे पर अलग अलग राय हो सकती है । बहरहाल मेरी तरफ से सानिया को ढ़ेर सारी शुभकामनाएं । संगीता को भी ढ़ेर सारा प्यार ।
गुरुवार, 6 अगस्त 2009
ईश्वर इन्हे माफ मत करना
प्रभात रंजन
...क्योंकि ये अच्छी तरह जानते हैं कि इन्होने क्या गुनाह किया है।
सैकड़ो-हजारों बार सुने हुए से अल्फाज...मीडिया और मीडिया के नाम पर थोथे,बेकार से शब्द...बाजार उपभोक्तावाद न्यूज रूम की मजबूरियां...हाय री सिर होने की दुश्वारियां...हाय री दुश्वारियों में फंसे दोस्तों की फरमाबर्दारियां...यहीं वो जगह है जहां कत्ल हुए थे तुम...ज्यादा पुरानी बात नहीं...और तब तुम्हारे गर्म उबलते खुन ने जमीन से कुछ वादे किए थे...लेकिन जंगल की हरियाली में तुम्हारी आत्मा ऐयाश हो गई...तुम देखते रहे...ताश की गड्डी मे से निकल कर एक जोकर सिंहासन पर जा बैठा...हैरान परेशान राजा मंत्री - यहां तक कि रानी भी...और तुम हुक्म बजा लाने के सामां हो गए...हैरत की बात नहीं दोस्त...भूख हर तहजीब को खा जाती है...खासकर के वो तहजीब जो तुमने किसी और से उधार ली हो...और जिस पर जमा ली हो तुमने अपनी दुकान...खैर जाने दो दोस्त...ठीक इसी नुक्ते पर कोई भी पालतू होने को मजबूर होता है... मैं जानता हूं मेरे भाई कि तुम्हारी आत्मा का भी एक चोर दरवाजा है जो संडास के पीछे खुलता है...लेकिन मैं क्या करूं...मैं आज भी व्याकरण की नाक पर रूमाल रखके...निष्ठा का तुक विष्ठा से नहीं मिला सकता...शायद इसीलिए जहां हूं, मेरी जगह वही हैं...मैं मानता हू कि मैने भी गलत किया...इस बंद कमरे को जहाजी बेडो का बंदरगाह समझके...इस अकाल बेला में...लेकिन क्या सचमुच तुम्हारी आत्मा का कोई भी अंश जीवित नहीं...हालाकि जीवित हो तुम...बावजूद इसके कि सब कुछ मर सा गया है...लिया बहुत कुछ दिया कुछ भी नहीं...फिर भी तुम जीवित हो...लेकिन मेरे दोस्त...जीने के पीछे अगर तर्क नहीं है...तो रंडियों की दलाली करने...और रामनामी बेच के जीने में...कोई फर्क नहीं है...दुख तो यही है कि तुम्हे तर्क की जरूरत नहीं...बावजूद इसके कि तुम्हारी पूरी जिन्दगी एक घटिया फिल्म के इंटरवल तक पहूंच चुकी है...तुम बडे मजे से अपने बच्चे के साथ पॉपकार्न चबा रहे हो...और संतुष्ट हो...जब कि तुम्हारे एक इंकार की जरूरत है...जबकि तुम्हारे एक विरोध से नए रास्ते निकल सकते हैं...कुछ और हो या ना हो...रथ पर खडे एक शिखंडी की मौत हो सकती है...यकीन करो दोस्त उसका हिजडापन पूरी पीढी के लिए एक बडी चुनौती है...लेकिन इन सबसे संज्ञान...तुम बह्मराक्षस बने हुए हो...क्योंकि तुम्हे लगता है...सूरज तुम्हें शीश झुकाने को निकलता है...और चांद तुम्हारी संध्या आरती के लिए...तुम खबरों में झूठी सार्थकता तलाशने का दंभ भरते हो...एक चोट खाये स्वाभिमान को चाटते...अपनी काबिलियत का स्वांग भरते हो...ठीक उस वक्त जब एक हिजडा अपनी नामरदी का डंका पीट रहा होता है...तुम चुप रहते हो...सच तो ये है कि तुम भी अपराधियों के संयुक्त दल के हिस्से हो... सच तो ये है कि...खैर आवाज देने से भी कुछ फायदा नहीं...उसने हर दरवाजा खटखटाया है...जिसकी भी पूंछ उठाई...उसे मादा पाया है...ये हमारे दौर की खूबसूरती है...तुम्हे सबकुछ बर्दाश्त है...क्योंकि तुम्हारी जरूरत अदद बीबी बच्चे और मकान है...इसके बाद जो कुछ भी है...बकवास है...फिर ये विधवा विलाप क्यों...कल जब पचासों सिर कलम कर दिए गए, और तुम तमाशा देखते रहे...हाथ कट गए और तुम सिर बने,बाल नोचते रहे...जब कुछ बेहद ईमानदार लोग तबाह हो गए...किस अदा से तुम जहांपनाह हो गए...सवाल तीखे हैं...मगर बेखबर से तुम...ड्रामेटिक अंदाज में मीडिया की मौजूदा मजबूरियों पर बहस करना चाहते हो...सेमिनार के बहाने...अपने बचे रहने की दलील देना चाहते हो...लेकिन तुम नही जानते दोस्त...बेमतलब शब्दों के सहारे ये मोर्चा हम हार जायेंगे...तुम नहीं जानते दोस्त, हिजडापन एक संक्रामक बिमारी है...जो हमले के लिए हमारे ठीक पीछे खडी है...और खबरों पर होने वाली किसी भी बहस से ज्यादा जरूरी है...इंसानी हक में खडा होना...(जो हमारे पेशे की टैग लाईन भी है)...दोस्त मेरे, पेट से अलग ,पीठ में एक रीढ की हड्डी होती है...तुम्हे याद दिला दूं...जो जीने की सबसे अनिवार्य शर्त होती है।
...क्योंकि ये अच्छी तरह जानते हैं कि इन्होने क्या गुनाह किया है।
सैकड़ो-हजारों बार सुने हुए से अल्फाज...मीडिया और मीडिया के नाम पर थोथे,बेकार से शब्द...बाजार उपभोक्तावाद न्यूज रूम की मजबूरियां...हाय री सिर होने की दुश्वारियां...हाय री दुश्वारियों में फंसे दोस्तों की फरमाबर्दारियां...यहीं वो जगह है जहां कत्ल हुए थे तुम...ज्यादा पुरानी बात नहीं...और तब तुम्हारे गर्म उबलते खुन ने जमीन से कुछ वादे किए थे...लेकिन जंगल की हरियाली में तुम्हारी आत्मा ऐयाश हो गई...तुम देखते रहे...ताश की गड्डी मे से निकल कर एक जोकर सिंहासन पर जा बैठा...हैरान परेशान राजा मंत्री - यहां तक कि रानी भी...और तुम हुक्म बजा लाने के सामां हो गए...हैरत की बात नहीं दोस्त...भूख हर तहजीब को खा जाती है...खासकर के वो तहजीब जो तुमने किसी और से उधार ली हो...और जिस पर जमा ली हो तुमने अपनी दुकान...खैर जाने दो दोस्त...ठीक इसी नुक्ते पर कोई भी पालतू होने को मजबूर होता है... मैं जानता हूं मेरे भाई कि तुम्हारी आत्मा का भी एक चोर दरवाजा है जो संडास के पीछे खुलता है...लेकिन मैं क्या करूं...मैं आज भी व्याकरण की नाक पर रूमाल रखके...निष्ठा का तुक विष्ठा से नहीं मिला सकता...शायद इसीलिए जहां हूं, मेरी जगह वही हैं...मैं मानता हू कि मैने भी गलत किया...इस बंद कमरे को जहाजी बेडो का बंदरगाह समझके...इस अकाल बेला में...लेकिन क्या सचमुच तुम्हारी आत्मा का कोई भी अंश जीवित नहीं...हालाकि जीवित हो तुम...बावजूद इसके कि सब कुछ मर सा गया है...लिया बहुत कुछ दिया कुछ भी नहीं...फिर भी तुम जीवित हो...लेकिन मेरे दोस्त...जीने के पीछे अगर तर्क नहीं है...तो रंडियों की दलाली करने...और रामनामी बेच के जीने में...कोई फर्क नहीं है...दुख तो यही है कि तुम्हे तर्क की जरूरत नहीं...बावजूद इसके कि तुम्हारी पूरी जिन्दगी एक घटिया फिल्म के इंटरवल तक पहूंच चुकी है...तुम बडे मजे से अपने बच्चे के साथ पॉपकार्न चबा रहे हो...और संतुष्ट हो...जब कि तुम्हारे एक इंकार की जरूरत है...जबकि तुम्हारे एक विरोध से नए रास्ते निकल सकते हैं...कुछ और हो या ना हो...रथ पर खडे एक शिखंडी की मौत हो सकती है...यकीन करो दोस्त उसका हिजडापन पूरी पीढी के लिए एक बडी चुनौती है...लेकिन इन सबसे संज्ञान...तुम बह्मराक्षस बने हुए हो...क्योंकि तुम्हे लगता है...सूरज तुम्हें शीश झुकाने को निकलता है...और चांद तुम्हारी संध्या आरती के लिए...तुम खबरों में झूठी सार्थकता तलाशने का दंभ भरते हो...एक चोट खाये स्वाभिमान को चाटते...अपनी काबिलियत का स्वांग भरते हो...ठीक उस वक्त जब एक हिजडा अपनी नामरदी का डंका पीट रहा होता है...तुम चुप रहते हो...सच तो ये है कि तुम भी अपराधियों के संयुक्त दल के हिस्से हो... सच तो ये है कि...खैर आवाज देने से भी कुछ फायदा नहीं...उसने हर दरवाजा खटखटाया है...जिसकी भी पूंछ उठाई...उसे मादा पाया है...ये हमारे दौर की खूबसूरती है...तुम्हे सबकुछ बर्दाश्त है...क्योंकि तुम्हारी जरूरत अदद बीबी बच्चे और मकान है...इसके बाद जो कुछ भी है...बकवास है...फिर ये विधवा विलाप क्यों...कल जब पचासों सिर कलम कर दिए गए, और तुम तमाशा देखते रहे...हाथ कट गए और तुम सिर बने,बाल नोचते रहे...जब कुछ बेहद ईमानदार लोग तबाह हो गए...किस अदा से तुम जहांपनाह हो गए...सवाल तीखे हैं...मगर बेखबर से तुम...ड्रामेटिक अंदाज में मीडिया की मौजूदा मजबूरियों पर बहस करना चाहते हो...सेमिनार के बहाने...अपने बचे रहने की दलील देना चाहते हो...लेकिन तुम नही जानते दोस्त...बेमतलब शब्दों के सहारे ये मोर्चा हम हार जायेंगे...तुम नहीं जानते दोस्त, हिजडापन एक संक्रामक बिमारी है...जो हमले के लिए हमारे ठीक पीछे खडी है...और खबरों पर होने वाली किसी भी बहस से ज्यादा जरूरी है...इंसानी हक में खडा होना...(जो हमारे पेशे की टैग लाईन भी है)...दोस्त मेरे, पेट से अलग ,पीठ में एक रीढ की हड्डी होती है...तुम्हे याद दिला दूं...जो जीने की सबसे अनिवार्य शर्त होती है।
शुक्रवार, 3 जुलाई 2009
गांव लौट जाना चाहता हूं
मित्रों को मजाक लगता है.कुछ ज्यादा संवेदनशील मित्र इसे काम का दबाव मानते हैं.कुछ ऐसे भी हैं जो इसे बकवास करार देंगे.दरअसल मेरी ख्वाहिश ही कुछ ऐसी है जिसे लोगबाग गंभीरता से नहीं लेते.मैं वाकई गांव वापस लौट जाना चाहता हूं.इसके पीछे कोई ठोस वजह नहीं है.शुरू शुरू में ये ख्याल एक लहर की तरह आया.लेकिन अब गाहे बिगाहे परेशान करता है.दावे के साथ कह सकता हूं कि इस ख्याल की वजह नास्टेल्जिया नहीं है.गांव में जाकर कोई सामाजिक आर्थिक क्रांति करने का इरादा भी नहीं.बस गांव में जाकर बसना चाहता हूं.हालाकि वहां से कभी उजड़ा हूं, ऐसा भी नहीं.मैं तो शुद्ध कस्बाई हूं.लेकिन गांव करीब था इसलिए आना जाना लगा रहा.अब नए सीरे से गांव में बसने को जी चाहता है.वैसे ही जैसै मेरे पूर्वज बसे होंगे पहली बार.मैं जानता हूं ये फैसला इतना आसान नहीं. जीवन यापन का सवाल एक बार फिर मुंह बाए खड़ा होगा.इसके अलावा कई साल दिल्ली जैसे शहर में गुजारने के बाद ठेठ गांव में जाकर रहने की अपनी चुनौतियां होंगी.दिक्कतें होंगी इतना जानता हूं.फैसले में हो रही देरी भी इसी वजह से है.लेकिन सच्चाई यही है कि इस शहर में होने की एक भी वजह मेरे पास नहीं है.किसी भी दूसरे प्रवासी की तरह इस शहर ने मेरी भी पहचान सालों पहले खत्म कर दी थी.पढाई लिखाई तक तो फिर भी ठीक था, लेकिन अब इस शहर का क्या करूं.कुछ ना करते करते एक दिन मैने खुद को इस शहर में रोजगार करते पाया.इस शहर ने मुझे रोजगार दिया है और इसके एवज में मुझसे हरेक चीज ले ली है जो मेरी अपनी होती थी.यहां तक कि मेरी आदतें भी.कई महिने गुजर गए, गालिब को नहीं पढ़ा.श्मशेर मेरे सामने धूल फांकते उदास बैठे रहते है.कमोबेश मेरे घर में कुछ सालों से उपेक्षा के ऐसे ही शिकार हैं मुक्तिबोध रघुवीर सहाय धूमिल और मजाज.यकीन मानिए जिन्दगी बड़ी ही नीरस हो चली है.कुछ इसकी वजह मेरे काम का अपना स्वभाव भी है.लेकिन काम करने की मजबूरी समझ में नहीं आती.किसी फरमाबर्दार नौकर की तरह अपने काम को अंजाम देता हूं.मैं भी किसी शाह का मुसाहिब बन के इतराना और काम से मुंह चुराना चाहता था.कर नहीं पाया.इसलिए अपने काबिल मित्रों की शिकायत भी नहीं करता.मेहनत के बल पर अपने आर्थिक हालात बेहतर करने का हौसला देर तक कायम रखा, लेकिन अक्सर ऐसा नहीं होता.मेरे मामले में भी नहीं हुआ.नतीजा, फाकेमस्ती ना सही लेकिन गुरबत का दौर आज भी जारी है.अपने सुबहो शाम अपने काम के नाम करके, गधा बन गया हूं.हालाकि इसी काम की बदौलत कई गधे सफलता के शिखर पर हैं.खैर ये तो अपनी अपनी काबिलियत और किस्मत की बात है.मेरे दिन नहीं फिरे, ना सही.लेकिन तब इस शहर में होने का औचित्य क्या है.खड़ा हूं आज भी रोटी के चार हर्फ लिए...सवाल ये है कि किताबों ने क्या दिया मुझको.कुछ नहीं.एक बेहद अतार्किक और बेमकसद सी जिन्दगी.दोस्तों इसी जिन्दगी से भागना चाहता हूं.पहली बार हालात से भागना चाहता हूं.मैं गांव लौट जाना चाहता हूं,अपने खेतों में जहां किसी ने, कभी गुलाब की फसल उगाने की कामना की थी.यकीन कीजिए गुलाब, खबरों से ज्यादा अहमियत रखते हैं (घोर निराशा के मूड में)
शुक्रवार, 1 मई 2009
मुद्दाविहीन चुनाव, लहर और जनसरोकार
अभी एक टेलिविजन डेवेट देख रहा था जिसमें राजदीप, आशुतोष. योगेंद्र यादव और श्रवण गर्ग भाग ले रहे थे। जाहिरन मुद्दा लोकसभा चुनाव ही था और बात घूमफिर वहीं आ अटकी थी कि चुनाव के बाद क्या होनेवाला है। एक बिन्दु पर लगभग सभी सहमत थे कि ये चुनाव मुद्दाविहीन चुनाव है और इसी वजह से किसी तरह की अटकलवाजी गलत हो सकती है। राजदीप ने कहा कि चुनाव में थोड़ाबहुत मुद्दा है तो वो महंगाई और आर्थिक मंदी है लेकिन मूलत: बड़े पैंमाने पर ये चुनाव लोकल इश्यूज पर लड़े जा रहे हैं। बिहार का मुद्दा अलग है कर्नाटक का अलग, यहां तक कि उत्तरी और दक्षिणी मुम्बई का मुद्दा भी अलग-अलग है। एक विद्वान का कहना था कि ये भी अपने आप में चिंता की बात है कि राजनैतिक परिपक्वता की ओर अग्रसर इतना बड़ा मुल्क एक राष्ट्रीय मुद्दा तक नहीं खोज पाया है। लेकिन इसके उलट भी कई तर्क हैं जो काफी मजबूत हैं।
ये कहना कि देश में राष्ट्रीय मुद्दों का अकाल हो गया है, सच से मुंह चुराना होगा। जिस देश की एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती हो, जिस देश में सिर्फ सस्ता अनाज उपलब्ध करवा कर वोट बटोरे जा सकते हों वहां मुद्दों का अभाव होना दरअसल कुछ खतरनाक इशारा करता है। सच्चाई तो ये है कि हमारे पास उतना कद्दावर नेतृत्व नहीं है जो कई बड़े मुद्दे को अपनी शख्सियत और पार्टी की विचारधारा में समेट सके। एक मुल्क के तौर पर यह हमारी बड़ी नाकामी है कि हमें औसत किस्म के सियासतदानों में से एक को अपना रहनुमा चुनना है।
दूसरी बात ये आजादी के कुछ ही दिनों के बाद से जब हमारे सपने टूटकर बिखरने लगे थे, हमने नकली मुद्दों की तरफ चुनाव को झोंकना शुरु कर दिया। जबसे हमने लहरों के आधार पर अपना वोट देना शुरु किय़ा हमारे नेतृत्व का दिवालियापन सामने आने लगा। मुझे लगता है कि ये साल इकहत्तर में भी हुआ जब हमने बंग्लादेश युद्ध के बाद फिर से इंदिराजी को चुना था, यहीं सन 84 में भी हुआ जब उनकी मौत के बाद राजीव गांधी गद्दीनशीं हुए थे। ऐसा सन् ൯൧ में भी हुआ और उसके बाद तो ये ൯൯ तक हुआ। दरअसल, हमारी चालाक सियासी पार्टियों ने जरुरी मुद्दों से हमें भटकाने के लिए लहर का ढ़ोंग रचा ताकि हम सवाल उठाना बंद कर दें। ये चुनाव इस मायने में काफी अच्छा है जब हम लाख बहकावे के बावजूद अपने मुद्दों के आधार पर-चाहे वो कईयों की नजर में कितने ही तुच्छ क्यों न हों-वोट कर रहे हैं।
दूसरी बात जो अहम है वो ये कि राष्ट्रीय मुद्दे या लहर जैसी बात बड़ी पार्टियों के हक में जाती है। यहां ये लिखने का मतलब बड़ी पार्टियों का विरोध नहीं है बल्कि इतना जरुर है कि छोटी पार्टियों के आने से लोकतंत्र ज्यादा मजबूत, जनापेक्षी और जवाबदेह बना है। हलांकि शुरुआती दौर में इसमें कुछ गिरावटें देखने को मिल सकती है लेकिन ऐसा तो हर विकासशील व्यवस्था में अनिवार्य होता है। हमें याद है कि कांग्रेस की बहुमत के जमाने में किस तरह सूबों के काबिल और जनाधारवाले नेताओं को ऊपर उठने का मौका नहीं मिलता था। आज ऐसी स्थिति नहीं है। हां, इससे बड़ी पार्टियां भी सीख ले रही है कि विराट और आभामंडल से घिरा हुआ नेतृत्व अब काबिल और लोकप्रिय नेताओं की अनेदेखी से बच रहा है।
कुल मिलाकर चुनाव ऐसी डगर पर चल पड़ा है जहां बड़े करीने से गढ़े गए लोकलुभावन चेहरे और नकली मुद्दों-जिन्हे राष्ट्रीयता का चोला पहना दिया जाता था-की अहमियत कम हुई है। हमारे यहां राष्ट्रीय छवि, मुद्दों और अपील को बड़ी चतुराई से घालमेल कर देने की परंपरा रही है, और वोटर इसबार इससे मुक्त होता हुआ दिखता है। राष्ट्रीय अपील का मतलब खूबसूरत चेहरे, खानदान, भावुकता और उन्माद न होकर जनसरोकारों की बात करनेवाली आवाज होनी चाहिए-जो फिलहाल तो नहीं दिख रही, लेकिन हो तो बेहतर है।
ये कहना कि देश में राष्ट्रीय मुद्दों का अकाल हो गया है, सच से मुंह चुराना होगा। जिस देश की एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती हो, जिस देश में सिर्फ सस्ता अनाज उपलब्ध करवा कर वोट बटोरे जा सकते हों वहां मुद्दों का अभाव होना दरअसल कुछ खतरनाक इशारा करता है। सच्चाई तो ये है कि हमारे पास उतना कद्दावर नेतृत्व नहीं है जो कई बड़े मुद्दे को अपनी शख्सियत और पार्टी की विचारधारा में समेट सके। एक मुल्क के तौर पर यह हमारी बड़ी नाकामी है कि हमें औसत किस्म के सियासतदानों में से एक को अपना रहनुमा चुनना है।
दूसरी बात ये आजादी के कुछ ही दिनों के बाद से जब हमारे सपने टूटकर बिखरने लगे थे, हमने नकली मुद्दों की तरफ चुनाव को झोंकना शुरु कर दिया। जबसे हमने लहरों के आधार पर अपना वोट देना शुरु किय़ा हमारे नेतृत्व का दिवालियापन सामने आने लगा। मुझे लगता है कि ये साल इकहत्तर में भी हुआ जब हमने बंग्लादेश युद्ध के बाद फिर से इंदिराजी को चुना था, यहीं सन 84 में भी हुआ जब उनकी मौत के बाद राजीव गांधी गद्दीनशीं हुए थे। ऐसा सन् ൯൧ में भी हुआ और उसके बाद तो ये ൯൯ तक हुआ। दरअसल, हमारी चालाक सियासी पार्टियों ने जरुरी मुद्दों से हमें भटकाने के लिए लहर का ढ़ोंग रचा ताकि हम सवाल उठाना बंद कर दें। ये चुनाव इस मायने में काफी अच्छा है जब हम लाख बहकावे के बावजूद अपने मुद्दों के आधार पर-चाहे वो कईयों की नजर में कितने ही तुच्छ क्यों न हों-वोट कर रहे हैं।
दूसरी बात जो अहम है वो ये कि राष्ट्रीय मुद्दे या लहर जैसी बात बड़ी पार्टियों के हक में जाती है। यहां ये लिखने का मतलब बड़ी पार्टियों का विरोध नहीं है बल्कि इतना जरुर है कि छोटी पार्टियों के आने से लोकतंत्र ज्यादा मजबूत, जनापेक्षी और जवाबदेह बना है। हलांकि शुरुआती दौर में इसमें कुछ गिरावटें देखने को मिल सकती है लेकिन ऐसा तो हर विकासशील व्यवस्था में अनिवार्य होता है। हमें याद है कि कांग्रेस की बहुमत के जमाने में किस तरह सूबों के काबिल और जनाधारवाले नेताओं को ऊपर उठने का मौका नहीं मिलता था। आज ऐसी स्थिति नहीं है। हां, इससे बड़ी पार्टियां भी सीख ले रही है कि विराट और आभामंडल से घिरा हुआ नेतृत्व अब काबिल और लोकप्रिय नेताओं की अनेदेखी से बच रहा है।
कुल मिलाकर चुनाव ऐसी डगर पर चल पड़ा है जहां बड़े करीने से गढ़े गए लोकलुभावन चेहरे और नकली मुद्दों-जिन्हे राष्ट्रीयता का चोला पहना दिया जाता था-की अहमियत कम हुई है। हमारे यहां राष्ट्रीय छवि, मुद्दों और अपील को बड़ी चतुराई से घालमेल कर देने की परंपरा रही है, और वोटर इसबार इससे मुक्त होता हुआ दिखता है। राष्ट्रीय अपील का मतलब खूबसूरत चेहरे, खानदान, भावुकता और उन्माद न होकर जनसरोकारों की बात करनेवाली आवाज होनी चाहिए-जो फिलहाल तो नहीं दिख रही, लेकिन हो तो बेहतर है।
बुधवार, 10 सितंबर 2008
नक्शे पे अब कुछ नज़र नही आता-बाढ़ है या कि बिहार है क्या है ?

भूतनाथ वाया राजीव थेपरा
(िजसने जहां से देखा...मंजर उसे उदास कर गया। बस एक तकलीफ ही है जिसे हम बांट रहे है...आपस मेें... अपनों से । इस उदासी को भी आपसे बांट रहा हूं, राजीव जी से बगैर पूछे। और इस आशा के साथ कि दुख की ये रात भी आखिरकार ढ़ल जाएगी)
कई दिनों से बिहार के ऊपर उड़ रहा हूँ !बहुत सारे लोगों की तरह मैं भी यही सोच रहा हूँ कि क्या किया जाए , मगर जैसे कि कुछ भी करने का कोई बहाना नहीं होता,वैसे ही कुछ न करने के सौ बहाने होते हैं !सो जैसे धरती के लोग जैसे अपने घर के दडबों में कैद हैं,वैसे ही मैं भी बेशक खुले आसमान में तैर रहा हूँ ,मगर हूँ एक तरह से दड्बो में ही ....!चारों और जो मंज़र देख रहा हूँ ,मेरी रूह कांप रही है .....पानी का ऐसा सैलाब ....तिनकों की तरह बहते लोग ,पशु और अन्य वस्तुएं ......बेबसी,लाचारी,वीभत्सता,आंसू,कातारता,पीडा,यंत्रणा.....और ना जाने क्या-क्या ...! उपरवाला दुनिया बनाकर क्या यही सब देखता रहता है?सीधे शब्दों में बात कहानी मुश्किल हो रही है,थोड़ा बदलकर कहता हूँ ......
ये जो मंज़र-ऐ विकराल है ,क्या है
हर तरफ़ हश्र है,काल है ,क्या है ?
पानी-ही-पानी है उफ़ ,हर जगह ,
कोशी क्यूँ बेकरार है ,क्या है ?
डबडबाई है आँख हर इंसान की
बह रही है ये बयार है ,क्या है?
लीलती जाती है नदी सब कुछ को
गुस्सा क्यूँ इस कदर है,क्या है ?
मुझको अपने ही रस्ते चलने दो
ख्वाहिशें-आदम तो दयार है ,क्या है ?
मैं तो सबको ही भरती चलती हूँ
तुम बनाते हो मुझपे बाँध ,क्या है ?
मुझको हंसने दो खिलखिलाने दो
मुझको छेडो ना इस कदर,क्या है ?
कोई आदम को जा कर समझाओ
धरती का चाक गरेबां है ,क्या है ?
हर तरफ़ खौफ से बेबस आँखें हैं
मौत का इंतज़ार है, क्या है ?
थाम लो ना इन सबको बाहों में
कर रहे जो ये फरियाद है, क्या है ?
कोई आदम का मुकाम समझाओ
हर कोई क्यूँ बेकरार है ,क्या है ?
जो भी बन पड़ता है इनको दे आओ
वरना खुदाई भी शर्मसार है ,क्या है ?
किसने छीना है इनका चैनो-सुकून
वो नेता है, अफसरान है क्या है ?
इनके हिस्से का कुछ भी मत खा जाना
दोजख भी जाओगे तो पूछेंगे, क्या है ?
नक्शे पे अब कुछ नज़र नही आता
बाढ़ है या कि बिहार है ,क्या है ?
साल- दर-साल ये घटना होती है ।होती चली आ रही है ,हजारों लोग हर साल असमय काल-कलवित हो रहे है ,मगर ऐसी लोमहर्षक घटनाओं में भी तो अनेकानेक लोगों की तो चांदी ही कट रही है ! लोग ज़रूरत का सामान भी कई गुना ज्यादा महँगा बेच रहे हैं !नाव वालों का भाव शेयरों की तरह चढा हुआ है ! बहुत सारे राहतकर्मी ग़लत कार्यों में लगे हुए हैं !राहतराशि और सामान बाँटने वाले बहुत सारे लोग यह सब कुछ बीच में ही हजम कर जा रहे है !यह तो गनीमत है कि ऐसे मौकों पर अधिसंख्य लोगों में मानवता कायम रहती है ,सो बहुत काम सुचारू रूप से हो जाता है ,वरना तो पीड़ित लोगों का भगवान् ही मालिक होता !!मैं दंग हूँ कि ऐसे आपातकाल में भी कुछ लोग ऐसे निपट स्वार्थी कैसे हो सकते है ,जो शर्म त्याग कर इन दिनों भी गंदे और नीच कर्मों में ही रत रहे !!हे भगवान् इन्हे माफ़ कभी मत करना !
शनिवार, 6 सितंबर 2008
कौशल्या देवी(मां) को श्रद्धांजली
प्रभात रंजन
कभी कभी सोचता हूं कि चन्द्रशेखर भाई जैसे लोग आखिर कैसे बनते हैं? सीवान जैसे शहर के एक दूर दराज गांव में पैदा होने वाला लड़का... कद-काठी समान्य...बाप- दादा की दी हुई कोई जागीर नहीं... लेकिन फिर भी ऐसा असाधारण व्यक्तित्व । अन्दर और बाहर दोनो की सादगी , जीवट और स्वाभिमान... चन्द्रशेखर भाई में कई ऐसी चीजें थी जो हम जैसो को जेएनयू के जमाने से प्रभावित करती थी। उनकी हत्या के बाद के सालों में धीरे - धीरे मैने समझा कि चन्द्रशेखर भाई को उनकी तालीम ने नहीं बल्कि मां ने बनाया था । अपने इकलौते बेटे की मृत्यु के बावजूद जो टूटे नहीं ऐसी औरत ही चन्द्रशेखर की मां हो सकती थी । चन्द्रशेखर भाई की हत्या के समय मैं सीवान में ही था । उनकी हत्या का विरोध करने जेएनयू के कुछ छात्र सीवान आए थे । तब के सीवान में शहाबुद्दीन का आतंक इतना था कि जेएनयू के वो छात्र जो सीवान से थे , इस विरोध सभा में शामिल नहीं हुए । खैर मैं उनकी कायरता का बखान नहीं करना चाहता । बस एक उम्रदराज, अकेली औरत के हिम्मत का जिक्र करना चाहता हूं। देश के गृहमंत्री ने मुआवजे के तौर पर एक लाख रूपए की रकम कौशल्या देवी को देने की पेशकश की । इकलौते बेटे के जाने के बाद वो रूपए एक अकेली औरत के लिए बड़ा सहारा बन सकते थे। लेिकन मां ने रूपए लेने से इंकार कर दिया । अगर कुछ मांगा तो बस इतना कि उनके बेटे के कातिल को सजा दी जाए । खैर राजनीतिक कारणों से इन्द्रजीत गुप्ता ऐसा नहीं कर सकते थे , नहीं किया । लेकिन कौशल्या देवी ने हार नहीं मानी। विरोध की जिस मसाल को चन्द्रशेखर भाई ने सीवान में जलाया उसे आगे बढ़कर उन्होने थाम लिया । िजसका नाम लेते हुए भी सीवान को लोग डरते थे , उसके खिलाफ उन्होने मोर्चा संभाल लिया । एक और प्रशासन और सरकार से शहाबुद्दीन को सजा देने की मांग करती रही तो दूसरी और हर मंच से शहाबुद्दीन को चुनौती देती रही कि अगर दम है तो मुझे मार कर दिखा । अपने लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए , अधिकार दिलाने के लिए , विधान सभा का चुनाव भी लड़ा । कौशल्या देवी सीवान में शहाबुद्दीन के खिलाफ प्रतिरोध की दीवार बन गईं । एक अटल , मजबुत दीवार । अब ये दीवार नहीं रही। दो दिन पहले कौशल्या देवी का देहांत हो गया है। न्याय के लिए ग्यारह साल लड़ने के बाद आखिरकार मां ने आंखे बंद कर ली । जिन्दगी जैसे अभावग्रस्त रही , मौत भी वैसी ही ...चुपचाप। आइए कोशल्या देवी को श्रद्धांजली दे और ईश्वर से प्रार्थना करे कि हमारे समाज में बहुत सारी कोशल्या देवी हो । क्योंकि कौशल्या ही चन्द्रशेखर को बनाती है।
कभी कभी सोचता हूं कि चन्द्रशेखर भाई जैसे लोग आखिर कैसे बनते हैं? सीवान जैसे शहर के एक दूर दराज गांव में पैदा होने वाला लड़का... कद-काठी समान्य...बाप- दादा की दी हुई कोई जागीर नहीं... लेकिन फिर भी ऐसा असाधारण व्यक्तित्व । अन्दर और बाहर दोनो की सादगी , जीवट और स्वाभिमान... चन्द्रशेखर भाई में कई ऐसी चीजें थी जो हम जैसो को जेएनयू के जमाने से प्रभावित करती थी। उनकी हत्या के बाद के सालों में धीरे - धीरे मैने समझा कि चन्द्रशेखर भाई को उनकी तालीम ने नहीं बल्कि मां ने बनाया था । अपने इकलौते बेटे की मृत्यु के बावजूद जो टूटे नहीं ऐसी औरत ही चन्द्रशेखर की मां हो सकती थी । चन्द्रशेखर भाई की हत्या के समय मैं सीवान में ही था । उनकी हत्या का विरोध करने जेएनयू के कुछ छात्र सीवान आए थे । तब के सीवान में शहाबुद्दीन का आतंक इतना था कि जेएनयू के वो छात्र जो सीवान से थे , इस विरोध सभा में शामिल नहीं हुए । खैर मैं उनकी कायरता का बखान नहीं करना चाहता । बस एक उम्रदराज, अकेली औरत के हिम्मत का जिक्र करना चाहता हूं। देश के गृहमंत्री ने मुआवजे के तौर पर एक लाख रूपए की रकम कौशल्या देवी को देने की पेशकश की । इकलौते बेटे के जाने के बाद वो रूपए एक अकेली औरत के लिए बड़ा सहारा बन सकते थे। लेिकन मां ने रूपए लेने से इंकार कर दिया । अगर कुछ मांगा तो बस इतना कि उनके बेटे के कातिल को सजा दी जाए । खैर राजनीतिक कारणों से इन्द्रजीत गुप्ता ऐसा नहीं कर सकते थे , नहीं किया । लेकिन कौशल्या देवी ने हार नहीं मानी। विरोध की जिस मसाल को चन्द्रशेखर भाई ने सीवान में जलाया उसे आगे बढ़कर उन्होने थाम लिया । िजसका नाम लेते हुए भी सीवान को लोग डरते थे , उसके खिलाफ उन्होने मोर्चा संभाल लिया । एक और प्रशासन और सरकार से शहाबुद्दीन को सजा देने की मांग करती रही तो दूसरी और हर मंच से शहाबुद्दीन को चुनौती देती रही कि अगर दम है तो मुझे मार कर दिखा । अपने लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए , अधिकार दिलाने के लिए , विधान सभा का चुनाव भी लड़ा । कौशल्या देवी सीवान में शहाबुद्दीन के खिलाफ प्रतिरोध की दीवार बन गईं । एक अटल , मजबुत दीवार । अब ये दीवार नहीं रही। दो दिन पहले कौशल्या देवी का देहांत हो गया है। न्याय के लिए ग्यारह साल लड़ने के बाद आखिरकार मां ने आंखे बंद कर ली । जिन्दगी जैसे अभावग्रस्त रही , मौत भी वैसी ही ...चुपचाप। आइए कोशल्या देवी को श्रद्धांजली दे और ईश्वर से प्रार्थना करे कि हमारे समाज में बहुत सारी कोशल्या देवी हो । क्योंकि कौशल्या ही चन्द्रशेखर को बनाती है।
बुधवार, 20 अगस्त 2008
पतझड़ के बाद का दुख
सुनन्दा राय
-इलाहाबाद से ये कविताएं सुनन्दा ने भेजी है... एक हल्के से संकोच के साथ । लिखा है - कच्चा पका सा कुछ लिखती हूं , जिसे मुमकिन है लोग, कविता की श्रेणी में ना रखे - लेकिन पूरी होने के बाद तो कविता स्वायत्त होती है जिस पर लिखने वाले का भी कोई जोर नहीं चलता ..... इसलिए अब पढ़ने वालों की राय ही मान्य होगी
(एक)
रोज टूटते हैं
पत्ते-
दरख्त नहीं मैं जानती हूं
पतझड़ के बाद का दुख ।
(दो)
सो जाती हूं तब
पैर दौड़ते हैं
तुम्हारे पीछे - पीछे ।
हाय री- गुड़िया रानी
कित्ता - कित्ता पानी ।
(तीन)
नुक्कड़ की दुकान से
दस रूपए का गुलाब खरीदकर
दिया उसने
और कहा - प्यार
वह एक शरीफ दुनियादार आदमी था।
(चार )
दो अंगुल की बुद्धि
मां की
चावल का पानी नापती रही
मैं दो अंगुल से देखती हूं
दुनिया
कितने पानी में ।
-इलाहाबाद से ये कविताएं सुनन्दा ने भेजी है... एक हल्के से संकोच के साथ । लिखा है - कच्चा पका सा कुछ लिखती हूं , जिसे मुमकिन है लोग, कविता की श्रेणी में ना रखे - लेकिन पूरी होने के बाद तो कविता स्वायत्त होती है जिस पर लिखने वाले का भी कोई जोर नहीं चलता ..... इसलिए अब पढ़ने वालों की राय ही मान्य होगी
(एक)
रोज टूटते हैं
पत्ते-
दरख्त नहीं मैं जानती हूं
पतझड़ के बाद का दुख ।
(दो)
सो जाती हूं तब
पैर दौड़ते हैं
तुम्हारे पीछे - पीछे ।
हाय री- गुड़िया रानी
कित्ता - कित्ता पानी ।
(तीन)
नुक्कड़ की दुकान से
दस रूपए का गुलाब खरीदकर
दिया उसने
और कहा - प्यार
वह एक शरीफ दुनियादार आदमी था।
(चार )
दो अंगुल की बुद्धि
मां की
चावल का पानी नापती रही
मैं दो अंगुल से देखती हूं
दुनिया
कितने पानी में ।
गुरुवार, 14 अगस्त 2008
मारे गए गुलफाम
प्रभात रंजन
बात इतनी सी थी कि, दीवार गिरने से, एक बकरी मारी गई थी । राजा के इंसाफ का तकाजा था कि बकरी के जान के बदले में दोषी आदमी को फांसी दी जाए । लेकिन ये भी गजब हुआ कि भिश्ती से लेकर कोतवाल तक सभी बारी- बारी बेगुनाह साबित हुए । अब बेचारा राजा इंसाफ करे भी तो कैसे करे । गहरे दुख में डूब गया राजा । आखिरकार राजा को बचाया मंत्री ने ... एक तरकीब बताई - किसी तगड़े आदमी के गले में डाल दो फांसी का फंदा , क्योंिक इंसाफ होना जरूरी है । ये कहानी लोगो ने पहले से सुन रखी थी ,इसलिए खुश थे क्योंकि आखिरकार फंदा मोटे - तगड़े आदमी के गले से उतरकर लालची राजा के गले में ही जाना था । बैकुठ के लालच में राजा को मारा जाना था । लेकिन कहानी ने छल किया ( बाद में कुछ लोगो ने कहा कि ये दरअसल समय का छल था)। तगड़े आदमी के ईशारे पर राजा ने भीड़ की तरफ फंदा उछाला । कई -कई फंदे एक साथ । कोई समझे तब तक कस गई रस्सी, गर्दन के चारो ओर। कई - कई गर्दन एक साथ । पलक झपकते झूल गए जिस्म हवा में । प्रतिरोध का कोई मौका नहीं , संभलने का कोई संकेत नहीं । तब राजा ने प्रजा की ओर देखा और शब्दों को चबाते हुए कहा कि - आइंदा हमारे राज्य में कोई बकरी नहीं मरनी चाहिए । जनता मौन - स्तब्ध । मरघट सा सन््नाटा काफी देर तक फैला रहा । बाद में, वहां मौजूद कुछ लोगो ने बताया कि इस नरसंहार के बाद राजा ने िमठाईयां बांटी । चुटकुले सुनाए और लोगो को हॅसने की राय दी । अब लोग हॅसने का प्रयास कर रहे है । हम कल भी हॅसेगे.
धर्म की आंच पर कश्मीर सुलग रहा है .... नोएडा के कुछ किसान परिवारों में मातम का माहौल है... संसद में कुछ दिन पहले ही लोकतंत्र को निर्वस्त्र किया गया है ... कुछ लोगो पर बेहद जुल्म हुआ है .... मेरे साथी , मेरे पड़ोसी जार - जार रो रहे है ... बावजूद इसके हम हॅसेगे। हॅसना सेहत के लिए बेहतर है । देश की आजादी की सालगिरह मुबारक दोस्तो । राजा अमर रहे ।
बात इतनी सी थी कि, दीवार गिरने से, एक बकरी मारी गई थी । राजा के इंसाफ का तकाजा था कि बकरी के जान के बदले में दोषी आदमी को फांसी दी जाए । लेकिन ये भी गजब हुआ कि भिश्ती से लेकर कोतवाल तक सभी बारी- बारी बेगुनाह साबित हुए । अब बेचारा राजा इंसाफ करे भी तो कैसे करे । गहरे दुख में डूब गया राजा । आखिरकार राजा को बचाया मंत्री ने ... एक तरकीब बताई - किसी तगड़े आदमी के गले में डाल दो फांसी का फंदा , क्योंिक इंसाफ होना जरूरी है । ये कहानी लोगो ने पहले से सुन रखी थी ,इसलिए खुश थे क्योंकि आखिरकार फंदा मोटे - तगड़े आदमी के गले से उतरकर लालची राजा के गले में ही जाना था । बैकुठ के लालच में राजा को मारा जाना था । लेकिन कहानी ने छल किया ( बाद में कुछ लोगो ने कहा कि ये दरअसल समय का छल था)। तगड़े आदमी के ईशारे पर राजा ने भीड़ की तरफ फंदा उछाला । कई -कई फंदे एक साथ । कोई समझे तब तक कस गई रस्सी, गर्दन के चारो ओर। कई - कई गर्दन एक साथ । पलक झपकते झूल गए जिस्म हवा में । प्रतिरोध का कोई मौका नहीं , संभलने का कोई संकेत नहीं । तब राजा ने प्रजा की ओर देखा और शब्दों को चबाते हुए कहा कि - आइंदा हमारे राज्य में कोई बकरी नहीं मरनी चाहिए । जनता मौन - स्तब्ध । मरघट सा सन््नाटा काफी देर तक फैला रहा । बाद में, वहां मौजूद कुछ लोगो ने बताया कि इस नरसंहार के बाद राजा ने िमठाईयां बांटी । चुटकुले सुनाए और लोगो को हॅसने की राय दी । अब लोग हॅसने का प्रयास कर रहे है । हम कल भी हॅसेगे.
धर्म की आंच पर कश्मीर सुलग रहा है .... नोएडा के कुछ किसान परिवारों में मातम का माहौल है... संसद में कुछ दिन पहले ही लोकतंत्र को निर्वस्त्र किया गया है ... कुछ लोगो पर बेहद जुल्म हुआ है .... मेरे साथी , मेरे पड़ोसी जार - जार रो रहे है ... बावजूद इसके हम हॅसेगे। हॅसना सेहत के लिए बेहतर है । देश की आजादी की सालगिरह मुबारक दोस्तो । राजा अमर रहे ।
बुधवार, 23 जुलाई 2008
जिसका गुन हरचरना गाता है....
मिथिलेश कुमार सिंह
आइए...भारतीय राजनीति के मछली बाजार
में...मैं आपका स्वागत करता हूं...हिचकिए मत...चले आइए...अगर आप शरीफ
हैं...इस बाजार से आपका पहले वास्ता नहीं पड़ा है...तो नाक पर रूमाल रख
लीजिए...सड़ांध है यहां...आप गश खाकर गिर सकते हैं...मुझे आदत है...मैं
आम आदमी हूं...इस बाजार के फरमान ही मेरी तकदीर तय करते हैं...मुझे कितना
कमाना है...कितना खाना है...कितना बोलना है...कितना लिखना है...सब यही
लोग बताते हैं....चौंकिए मत...हम गुलाम नहीं हैं...आजाद हैं...और ये जो
बाजार है ना साहब....इसे हमारे लोग संसद कहते हैं...इसमें हमारे नुमाइंदे
रहते हैं...कितने प्यारे चेहरे हैं...वो कहते हैं ना साहब के....
"सियासी आदमी की शक्ल तो प्यारी निकलती है...
मगर जब गुफ्तगू करता है चिंगारी निकलती है...
कुछ ऐसा ही है यहां....हम तो इसकी पूजा करते थे...लेकिन पिछले कुछ सालों
से हमारा इस मंदिर से भरोसा उठ गया...कुछ अजीब सा माहौल है यहां...पहले
मुद्दों पर बहस होती थी....आज बहस में से लोग मुद्दे निकालते हैं....चोर
हैं यहां...उचक्के हैं...दमड़ी के दलाल हैं सब...बच के ना रहे तो चमड़ी
भी उधेड़ लेंगे...देखा ना आपने....नोटों की गड्डियां....हमारे मंदिर
में...चलो साहब...इसी बहाने देश के करोड़ों लोगों ने करोड़ रूपया तो देख
लिया...नहीं तो सबसे बड़ी नोटों की गड्डी तो तभी दिखती हैं जब बाबू जी
बहन की शादी के लिए दहेज का पैसा घर लाते हैं...खैर संसद में चोर-उचक्के
बैठेंगे तो यही होगा ना...अरेरेरे...घबराइये मत...ये शोर तो यहां आम बात
है....ये शोर ना हो तो बाजार का फील ही नहीं होता...ऊंघने लगते हैं
लोग...देश जाए खड्डे में...बहस न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर...और यहां
सिर्फ उखाड़े गए गड़े मुर्दे...खींचा-तानी चलती रही...खूब कीचड़ उछाले
गए....अपनी पीठ ठोंकी गई...क्या करें साहब...अब सीना ठोंकने की किसी की
औकात नहीं रही...कैरेक्टर नहीं रहा ना साहब....सब अपने जुगाड़
में...सरकार गिरी तो अलाने का फायदा....नहीं गिरी तो फलाने का....देश गया
खड्डे में...शशिकला का बेटा कलेक्टर बनेगा...लोग मुस्कुरा रहे थे
साहब...बिजली नहीं है...पानी नहीं...पता नहीं बड़ा होगा भी या
नहीं....विदर्भ का है ना साहब...क्या पता...वो तो रोटी बेलता है...खेलने
वाले तो यहां बैठे हैं...सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं...सबकी 'पाइपलाइन'
में बड़े-बड़े प्रोजेक्ट हैं...पाइपलाइन समझते हैं ना....ये गड्डियां उसी
पाइपलाइन से आती हैं...खैर...दो दिन खूब मजा आया...दुश्मन दोस्त बन
गए....दोस्त दुश्मन बन गए....जिन घोड़ों को चार साल किसी ने घास नहीं
डाली...आज घुड़दौड़ के समय उन्होंने खूब नखरे दिखाए...जम के कलाबाजियां
खाईं....जब तक पेट नहीं भरा...हिनहिनाए नहीं....हमारा देश सेकुलर
है...हमें भी इन्हीं लोगों ने बताया...कौन सेकुलर हो कौन नहीं...यही हमें
बताते हैं...खैर साहब...शुरूआत विडंबना से हुई थी...खत्म भी वहीं से करते
हैं....विडंबना ये कि जो बहस मंहगाई और आत्महत्या के मुद्दे पर होनी
चाहिए थी...वो न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर हो रही थी...विदेश नीति आम
आदमी नहीं जानता भाई...उसे ये पता है कि प्याज और पेट्रोल मंहगा होगा तो
सरकार को वोट नहीं देना है...विडंबना ये कि देश के सम्मान का प्रतीक रहे
इस मंदिर में जेल से सवारियां आती हैं...विडंबना ये कि स्वस्थ बहस की
परंपरा दम तोड़ रही है...संसद में लहरा रही हैं नोटों की
गड्डियां....कितनी गिनाएं...कहां तक गिनोगे...छोड़ो साहब...चलो...पेप्सी
वाला ब्रेक लेते हैं....रात में दो पैग रम मारेंगे...सारे गम सुबह तक
साफ....फिर वही जन-गण-मन गाएगा हरचरना....फटा सुथन्ना पहने....अपना लड़का
है साहब...सपने तो देखो स्साले के....लीडर बनना चाहता है....
आइए...भारतीय राजनीति के मछली बाजार
में...मैं आपका स्वागत करता हूं...हिचकिए मत...चले आइए...अगर आप शरीफ
हैं...इस बाजार से आपका पहले वास्ता नहीं पड़ा है...तो नाक पर रूमाल रख
लीजिए...सड़ांध है यहां...आप गश खाकर गिर सकते हैं...मुझे आदत है...मैं
आम आदमी हूं...इस बाजार के फरमान ही मेरी तकदीर तय करते हैं...मुझे कितना
कमाना है...कितना खाना है...कितना बोलना है...कितना लिखना है...सब यही
लोग बताते हैं....चौंकिए मत...हम गुलाम नहीं हैं...आजाद हैं...और ये जो
बाजार है ना साहब....इसे हमारे लोग संसद कहते हैं...इसमें हमारे नुमाइंदे
रहते हैं...कितने प्यारे चेहरे हैं...वो कहते हैं ना साहब के....
"सियासी आदमी की शक्ल तो प्यारी निकलती है...
मगर जब गुफ्तगू करता है चिंगारी निकलती है...
कुछ ऐसा ही है यहां....हम तो इसकी पूजा करते थे...लेकिन पिछले कुछ सालों
से हमारा इस मंदिर से भरोसा उठ गया...कुछ अजीब सा माहौल है यहां...पहले
मुद्दों पर बहस होती थी....आज बहस में से लोग मुद्दे निकालते हैं....चोर
हैं यहां...उचक्के हैं...दमड़ी के दलाल हैं सब...बच के ना रहे तो चमड़ी
भी उधेड़ लेंगे...देखा ना आपने....नोटों की गड्डियां....हमारे मंदिर
में...चलो साहब...इसी बहाने देश के करोड़ों लोगों ने करोड़ रूपया तो देख
लिया...नहीं तो सबसे बड़ी नोटों की गड्डी तो तभी दिखती हैं जब बाबू जी
बहन की शादी के लिए दहेज का पैसा घर लाते हैं...खैर संसद में चोर-उचक्के
बैठेंगे तो यही होगा ना...अरेरेरे...घबराइये मत...ये शोर तो यहां आम बात
है....ये शोर ना हो तो बाजार का फील ही नहीं होता...ऊंघने लगते हैं
लोग...देश जाए खड्डे में...बहस न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर...और यहां
सिर्फ उखाड़े गए गड़े मुर्दे...खींचा-तानी चलती रही...खूब कीचड़ उछाले
गए....अपनी पीठ ठोंकी गई...क्या करें साहब...अब सीना ठोंकने की किसी की
औकात नहीं रही...कैरेक्टर नहीं रहा ना साहब....सब अपने जुगाड़
में...सरकार गिरी तो अलाने का फायदा....नहीं गिरी तो फलाने का....देश गया
खड्डे में...शशिकला का बेटा कलेक्टर बनेगा...लोग मुस्कुरा रहे थे
साहब...बिजली नहीं है...पानी नहीं...पता नहीं बड़ा होगा भी या
नहीं....विदर्भ का है ना साहब...क्या पता...वो तो रोटी बेलता है...खेलने
वाले तो यहां बैठे हैं...सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं...सबकी 'पाइपलाइन'
में बड़े-बड़े प्रोजेक्ट हैं...पाइपलाइन समझते हैं ना....ये गड्डियां उसी
पाइपलाइन से आती हैं...खैर...दो दिन खूब मजा आया...दुश्मन दोस्त बन
गए....दोस्त दुश्मन बन गए....जिन घोड़ों को चार साल किसी ने घास नहीं
डाली...आज घुड़दौड़ के समय उन्होंने खूब नखरे दिखाए...जम के कलाबाजियां
खाईं....जब तक पेट नहीं भरा...हिनहिनाए नहीं....हमारा देश सेकुलर
है...हमें भी इन्हीं लोगों ने बताया...कौन सेकुलर हो कौन नहीं...यही हमें
बताते हैं...खैर साहब...शुरूआत विडंबना से हुई थी...खत्म भी वहीं से करते
हैं....विडंबना ये कि जो बहस मंहगाई और आत्महत्या के मुद्दे पर होनी
चाहिए थी...वो न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर हो रही थी...विदेश नीति आम
आदमी नहीं जानता भाई...उसे ये पता है कि प्याज और पेट्रोल मंहगा होगा तो
सरकार को वोट नहीं देना है...विडंबना ये कि देश के सम्मान का प्रतीक रहे
इस मंदिर में जेल से सवारियां आती हैं...विडंबना ये कि स्वस्थ बहस की
परंपरा दम तोड़ रही है...संसद में लहरा रही हैं नोटों की
गड्डियां....कितनी गिनाएं...कहां तक गिनोगे...छोड़ो साहब...चलो...पेप्सी
वाला ब्रेक लेते हैं....रात में दो पैग रम मारेंगे...सारे गम सुबह तक
साफ....फिर वही जन-गण-मन गाएगा हरचरना....फटा सुथन्ना पहने....अपना लड़का
है साहब...सपने तो देखो स्साले के....लीडर बनना चाहता है....
तमाशा-ए -अहल-ए-करम देखते हैं
प्रभात रंजन
कल की बात है । घर से अॉफिस के दरम्यान मेरे साथ एक हादसा हुआ । हादसा कुछ यूं नहीं कि सिर-पैर- हाथ टूट जाएं । हुआ कुछ यूं कि दिमाग कि नसें झनझना गईं। मैं बस में चलता हूं और दिल्ली की बसों में आए दिन किसी न किसी ऐसी चीज का सामना होता ही रहता है कि बस चुप रह जाइए । ये हादसा जिसका जिक्र है ... लेकिन कुछ अलग था। जिस सीट के पास में खड़ा था, उसपर एक तोंदधारी महाशय मय साजो समान अपने पुत्र के साथ कुछ इस तरह बैठे थे कि जैसे तख्ते- ताउस पर बैठे हों। खैर .. बस में खड़ा आदमी एक अदद सीट की आरजू रखता है । मैं भी अपनी आरजूओं को अपनी नजरों में समेटे आगे-पीछे देख रहा था कि अचानक मेरे साथ यात्रा कर रहे मेरे साथी दीपक जी ने मेरा घ्यान इस हादसे की ओर खिंचा । सीट के ठीक ऊपर सफेद हर्फों में लिखा था ... विधायक । सीट की फिक्र कहीं सरक गई। माथे पर कुछ पसीने की बुंदे थी ...गायब हो गई। दिल्ली में सीटों के अलग- अलग तरीकें के अारक्षण मैनें देखे हैं । महिलाओं का एक तिहाई सीटों पर दावा तो खैर काफी पहले से है ... लेकिन जब से प्राइवेट बसें चलनी शुरू हुई , कुछ और नई श्रेणियां भी बनी ।पहले स्वतंत्रता सेनानी और बाद में स्वतंत्रा सेनानी के विधवाअों के लिए भी एक सीट की गुंजायश बनाई गई । दिल्ली के बस मालिकों की ओर से ये उपहार शायद कारगील युद्ध के बाद दिया गया था । वरिष्ठ नागरिकों का भी ख्याल प्राइवेट बसों में रखा गया और एक सीट खासतौर पर उन्हें भी मुहैया कराई गई। वरिष्ठों के आगे वाली सीट पहले से ही विकलांगों के लिए थी , आज भी है । खैर इतने सारे आरक्षणों के बाद जब विधायकों के लिए सीट का इंतजाम देखा तो , कलेजा मुंह को आ गया । कई भाव एक साथ आए और इतनी जल्दी आए कि आखिर में कुछ नहीं बचा । दिल्ली की बात तो जाने दीजिए , हिन्दुस्तान का कोई भी विधायक बसों में सफर नहीं करता होगा, तो विधायक के लिए दिल्ली की किसी बस में सीट सुरक्षित रखने का क्या आशय हो सकता है? मुमकिन है बस- मालिक अपने तरीके से लोकतंत्र का सम्मान करना चाहता हो। लेकिन विधायक जी को सीट मुहैया कराने के बाद सोंचने वाली बात ये है कि एक आम नागरिक के लिए कुल कितनी सीटें शेष रह गईं । एक और बात जिसपर मेरी तरह हर गरीब और असहाय नागरिक ने ध्यान दिया होगा । सरकारी बसों में कंडक्टर के लिए पीछे की ओर एक सीट खासतौर पर बनी होती है ,जिसपर किसी भी हालत में कोई यात्री नहीं बैठ सकता। पुरी सीट पर पलथी मार के कंडक्टर साहब कुछ ऐसे बैठते है कि जैसे बस उनके पुरखों ने उन्हे विरासत में दी हो और दुसरों को बिठा कर वे एहसान कर रहे हों। खैर ये तो सरकारी महकमे की बात है... प्राइवेट बसें तो इस मामले में भी आगे निकल गईं । कंडक्टर के लिए एक सीट पीछे तो थी ही , एक सीट आगे भी रखी गईं । ये अलग बात है कि इन दोनों सीटों पर कंडक्टर साहब शायद ही कभी बैठते हैं। सभी जानते है कि कंडक्टर साहब के कोटे की ये सीटें किसी लड़की या महिला को बतौर उपहार मुहैया कराई जाती हैं। अगर गलती से आप बैठ गए तो ये कंडक्टर की शान में गुस्ताखी मानी जाएगी , लेकिन अगर कोई महिला उस सीट पर नहीं बैठकर खड़ी रह जाए तो ये कंडक्टरी मेहमांनवाजी की तौहीन मानी जा सकती है ।वैसे ये तौहीन अक्सर नहीं की जाती । खैर, अब नई- पुरानी सभी श्रेणियों को दी गईं सुरक्षित सीटों में अगर कंडक्टर साहब की दो सीटें भी जोड़ दी जाए तो बस में आम आदमी के लिए कोई जगह नहीं बचती । है भी नहीं । अब बचा पत्रकार ... वैसे तो विधायक की तरह ये जन्तु भी बसों में शायद ही सफर करता है । अगर बिल्कुल ही नया हो और किसान - परिवार से हो तो अलग बात है , वरना हीरो- होन्डा तक तो उसकी पहुंच हो ही गई है। पॉल गोमरा का स्कूटर जब से दुर्घटनाग्रस्त हुआ , तब से कोई पत्रकार स्कूटर नहीं चलाता । लेकिन कुछ मेरे जैसे पत्रकार अभी भी है जिन्हें अपनी सवारी आज भी मयस्सर नहीं और बसों में खड़े - खड़े सफर करना जिनका नसीब है । सो चला जा रहा हूं और सोंच रहा हूं कि जाने कब दिल्ली के बस मालिकों को अक्ल आएगी और वे पत्रकारों के लिए भी एक सीट सुरक्षित करने का फैसला करेंगे ।
कल की बात है । घर से अॉफिस के दरम्यान मेरे साथ एक हादसा हुआ । हादसा कुछ यूं नहीं कि सिर-पैर- हाथ टूट जाएं । हुआ कुछ यूं कि दिमाग कि नसें झनझना गईं। मैं बस में चलता हूं और दिल्ली की बसों में आए दिन किसी न किसी ऐसी चीज का सामना होता ही रहता है कि बस चुप रह जाइए । ये हादसा जिसका जिक्र है ... लेकिन कुछ अलग था। जिस सीट के पास में खड़ा था, उसपर एक तोंदधारी महाशय मय साजो समान अपने पुत्र के साथ कुछ इस तरह बैठे थे कि जैसे तख्ते- ताउस पर बैठे हों। खैर .. बस में खड़ा आदमी एक अदद सीट की आरजू रखता है । मैं भी अपनी आरजूओं को अपनी नजरों में समेटे आगे-पीछे देख रहा था कि अचानक मेरे साथ यात्रा कर रहे मेरे साथी दीपक जी ने मेरा घ्यान इस हादसे की ओर खिंचा । सीट के ठीक ऊपर सफेद हर्फों में लिखा था ... विधायक । सीट की फिक्र कहीं सरक गई। माथे पर कुछ पसीने की बुंदे थी ...गायब हो गई। दिल्ली में सीटों के अलग- अलग तरीकें के अारक्षण मैनें देखे हैं । महिलाओं का एक तिहाई सीटों पर दावा तो खैर काफी पहले से है ... लेकिन जब से प्राइवेट बसें चलनी शुरू हुई , कुछ और नई श्रेणियां भी बनी ।पहले स्वतंत्रता सेनानी और बाद में स्वतंत्रा सेनानी के विधवाअों के लिए भी एक सीट की गुंजायश बनाई गई । दिल्ली के बस मालिकों की ओर से ये उपहार शायद कारगील युद्ध के बाद दिया गया था । वरिष्ठ नागरिकों का भी ख्याल प्राइवेट बसों में रखा गया और एक सीट खासतौर पर उन्हें भी मुहैया कराई गई। वरिष्ठों के आगे वाली सीट पहले से ही विकलांगों के लिए थी , आज भी है । खैर इतने सारे आरक्षणों के बाद जब विधायकों के लिए सीट का इंतजाम देखा तो , कलेजा मुंह को आ गया । कई भाव एक साथ आए और इतनी जल्दी आए कि आखिर में कुछ नहीं बचा । दिल्ली की बात तो जाने दीजिए , हिन्दुस्तान का कोई भी विधायक बसों में सफर नहीं करता होगा, तो विधायक के लिए दिल्ली की किसी बस में सीट सुरक्षित रखने का क्या आशय हो सकता है? मुमकिन है बस- मालिक अपने तरीके से लोकतंत्र का सम्मान करना चाहता हो। लेकिन विधायक जी को सीट मुहैया कराने के बाद सोंचने वाली बात ये है कि एक आम नागरिक के लिए कुल कितनी सीटें शेष रह गईं । एक और बात जिसपर मेरी तरह हर गरीब और असहाय नागरिक ने ध्यान दिया होगा । सरकारी बसों में कंडक्टर के लिए पीछे की ओर एक सीट खासतौर पर बनी होती है ,जिसपर किसी भी हालत में कोई यात्री नहीं बैठ सकता। पुरी सीट पर पलथी मार के कंडक्टर साहब कुछ ऐसे बैठते है कि जैसे बस उनके पुरखों ने उन्हे विरासत में दी हो और दुसरों को बिठा कर वे एहसान कर रहे हों। खैर ये तो सरकारी महकमे की बात है... प्राइवेट बसें तो इस मामले में भी आगे निकल गईं । कंडक्टर के लिए एक सीट पीछे तो थी ही , एक सीट आगे भी रखी गईं । ये अलग बात है कि इन दोनों सीटों पर कंडक्टर साहब शायद ही कभी बैठते हैं। सभी जानते है कि कंडक्टर साहब के कोटे की ये सीटें किसी लड़की या महिला को बतौर उपहार मुहैया कराई जाती हैं। अगर गलती से आप बैठ गए तो ये कंडक्टर की शान में गुस्ताखी मानी जाएगी , लेकिन अगर कोई महिला उस सीट पर नहीं बैठकर खड़ी रह जाए तो ये कंडक्टरी मेहमांनवाजी की तौहीन मानी जा सकती है ।वैसे ये तौहीन अक्सर नहीं की जाती । खैर, अब नई- पुरानी सभी श्रेणियों को दी गईं सुरक्षित सीटों में अगर कंडक्टर साहब की दो सीटें भी जोड़ दी जाए तो बस में आम आदमी के लिए कोई जगह नहीं बचती । है भी नहीं । अब बचा पत्रकार ... वैसे तो विधायक की तरह ये जन्तु भी बसों में शायद ही सफर करता है । अगर बिल्कुल ही नया हो और किसान - परिवार से हो तो अलग बात है , वरना हीरो- होन्डा तक तो उसकी पहुंच हो ही गई है। पॉल गोमरा का स्कूटर जब से दुर्घटनाग्रस्त हुआ , तब से कोई पत्रकार स्कूटर नहीं चलाता । लेकिन कुछ मेरे जैसे पत्रकार अभी भी है जिन्हें अपनी सवारी आज भी मयस्सर नहीं और बसों में खड़े - खड़े सफर करना जिनका नसीब है । सो चला जा रहा हूं और सोंच रहा हूं कि जाने कब दिल्ली के बस मालिकों को अक्ल आएगी और वे पत्रकारों के लिए भी एक सीट सुरक्षित करने का फैसला करेंगे ।
रविवार, 13 जुलाई 2008
एक ताज़ा खबर और लड़की
मिथिलेश कुमार सिंह
(इस ब्लाॉग पर कविता को लेकर खासी चर्चा हो चुकी है ... और इसीलिए किसी भी कविता को यहां देने से पहले एक संशय लाजिमी था... फिर भी मिथिलेश की ये कविता एक बार पढ़े जाने की मांग करती है ... इसलिए इसे सरेआम करने को मजबुर हूं .... मिथिलेश अच्छे टीवी पत्रकार तो हैं ही , सोंचते भी अच्छा हैं )
आपको नहीं लगता...कभी-कभी...
कि लड़कियां भी खबरों की तरह होती हैं...
कुछ अच्छी...कुछ बुरी...
कुछ टाइम पास...
कुछ बेकार...कुछ चलने वाली लड़कियां/खबरें
कुछ में टीआरपी होती है...
जैसे कुछ लड़कियों में...
कुछ खबरें अच्छी होती हैं...
लेकिन टीआरपी नहीं देतीं...
इसलिए नहीं चलतीं...
अच्छी खबरों की चर्चा कम ही होती है...
जैसे अच्छी लड़कियों की...
हर कोने में लोगों की निगाहें
सिर्फ नई खबरों ? पर होती हैं...
जैसे हर मर्द ? की नई लड़कियों पर...
खबरें जुटाई जाती हैं...
जैसे लड़कियां...
फिर शुरू होती है
खबरों की नक्काशी...
उन्हें सजाया जाता है...
जैसे लड़कियों को सजाते हैं...
खबरों को देखने लायक बनाते हैं...
जैसे लड़कियों की नुमाइश होती है...
नक्काशीदार खबर...
तराशी हुई लड़की...
तैयार है परोसने के लिए...
फिर खबरों से खेलते हैं...
जैसे लड़कियों से...
लोग चटखारे लेंगे...
लार टपकाएंगे...
अफसोस करेंगे...
जांघें खुजलाएंगे...
फिर निगाहें गड़ा देंगे अगली खबर पर...
जैसे अगली लड़की पर...
गुम हो जाती हैं खबरें ...
इस पूरी प्रक्रिया में...
सजाने और परोसने में...
जैसे कहीं गुम हो जाती है लड़की...
(इस ब्लाॉग पर कविता को लेकर खासी चर्चा हो चुकी है ... और इसीलिए किसी भी कविता को यहां देने से पहले एक संशय लाजिमी था... फिर भी मिथिलेश की ये कविता एक बार पढ़े जाने की मांग करती है ... इसलिए इसे सरेआम करने को मजबुर हूं .... मिथिलेश अच्छे टीवी पत्रकार तो हैं ही , सोंचते भी अच्छा हैं )
आपको नहीं लगता...कभी-कभी...
कि लड़कियां भी खबरों की तरह होती हैं...
कुछ अच्छी...कुछ बुरी...
कुछ टाइम पास...
कुछ बेकार...कुछ चलने वाली लड़कियां/खबरें
कुछ में टीआरपी होती है...
जैसे कुछ लड़कियों में...
कुछ खबरें अच्छी होती हैं...
लेकिन टीआरपी नहीं देतीं...
इसलिए नहीं चलतीं...
अच्छी खबरों की चर्चा कम ही होती है...
जैसे अच्छी लड़कियों की...
हर कोने में लोगों की निगाहें
सिर्फ नई खबरों ? पर होती हैं...
जैसे हर मर्द ? की नई लड़कियों पर...
खबरें जुटाई जाती हैं...
जैसे लड़कियां...
फिर शुरू होती है
खबरों की नक्काशी...
उन्हें सजाया जाता है...
जैसे लड़कियों को सजाते हैं...
खबरों को देखने लायक बनाते हैं...
जैसे लड़कियों की नुमाइश होती है...
नक्काशीदार खबर...
तराशी हुई लड़की...
तैयार है परोसने के लिए...
फिर खबरों से खेलते हैं...
जैसे लड़कियों से...
लोग चटखारे लेंगे...
लार टपकाएंगे...
अफसोस करेंगे...
जांघें खुजलाएंगे...
फिर निगाहें गड़ा देंगे अगली खबर पर...
जैसे अगली लड़की पर...
गुम हो जाती हैं खबरें ...
इस पूरी प्रक्रिया में...
सजाने और परोसने में...
जैसे कहीं गुम हो जाती है लड़की...
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