शनिवार, 24 मई 2008

बेतुका सर्वे हैं बापू, सुभाष और भगत की तुलना....

वैसे तो इस तरह के सर्वे बड़े ही बेतुके किस्म के होते हैं कि कौन बड़ा है और कौन छोटा, ठीक उसी तरह जैसे माता और पिता में तुलना करने कह दिया जाए। लेकिन अगर मेरी व्यक्तिगत राय मानें तो गांधी का योगदान व्यापक और ठोस था। गांधी के आलोचकों का कहना है कि गांधीजी पूंजीवाद के समर्थक थे और उन्होनें कई दफा वर्णव्यवस्था को भी सही ठहराया था लेकिन उस समय की परिस्थितियों पर गौर करें तो आजादी के लिए जो भी उपलव्ध और सटीक तरीका हो सकता था, गांधी ने सबको अपनाया। जहां तक हथियार के बल पर आजादी की बात थी तो 1857 में यह प्रयोग बुरी तरह असफल हो चुका था..और लगभग यहीं हाल उसका (बहुत अनुकूल हालात होते हुए भी) सुभाष बाबू के अभियान में भी हुआ। क्रान्तिकारियों की छिटपुट लड़ाईयां सिवाय प्रेरणा देने के और कुछ नहीं कर रही थी और उसका कोई संगठित स्वरुप नहीं था। वो सिर्फ एक छोटे से पढ़े लिखे तबके तक सीमित थी। लोग कहते हैं कि अंग्रेजों ने 1947 में भारत को इसलिए आजादी दे दी कि उसे भारतीय सेना पर से यकीन उठ गया था। यह सुभाष बाबू के ही कारनामों का नतीजा था कि बंम्बई में 1946 में नौसेना विद्रोह हो गया..और अंग्रेजों को जल्दी ही भारत छोड़ने के लिए सोचना पड़ा। अंग्रेज और पश्चिमी ताकतें नहीं चाहती थी कि हिंदुस्तान में एक रिवोल्यूशनरी किस्म की सरकार बने जिसकी कमान एक व्यक्ति या सेना के हाथ में रहे। इसलिए सत्ता का हस्तांतरण जल्दवाजी में किया गया और कांग्रेस जैसी यथास्थितिवादी पार्टी के हाथों कमान सौप दी गई..जिससे व्यापक पश्चिमी हित और एक छोटे से एंग्लोइंडियन कुनबे पर कोई आंच न आए। अगर मान लिया जाए कि ये तमाम बातें सच भी हैं तो भी इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि कांग्रेस को आमलोगों की पार्टी बनाने और हिंदुस्तान जैसे अनिश्चित स्वभाव वालें मुल्क में गांधी ने एक ठोस और आमसहमति वाला लीडरशिप पेश किया। ये गांधी की ही शख्सियत थी जिसके बदौलत सरदार पटेल बिना खून खराबा कराए सैकड़ो रियासतों को हिंदुस्तान में समेट पाए। जिस काम को करने में यूरोपीय यूनियन अभी तक सफल नहीं हो पाया है..वो गांधी के चट्टानी व्यक्तित्व के बदौलत मिनटों में हो गया। ये गांधी ही थे जिन्होने अम्वेदकर के साथ बड़ी सूझ-बूझ से दलित समस्या का समाधान किया था। शायद उस हिसाब से हिंदू धर्म के प्रति उनका योगदान एतिहासिक है।

गांधी की सबसे बड़ी आलोचना क्या है?..मुसलमानों का तुष्टीकरण या पूंजीवादियों को प्रश्रय? क्या हिंदुस्तान जैसे मुल्क से सारे मुसलमानों को निकाल पाना संभव था। उस समय के हालात की कल्पना कीजिए...एक नदी-नाले, पहाड़ और घाटियों से अंटे पड़े मुल्क में जहां कोई कौंम पिछले हजार साल से रहती हो..जहां संचार के साधन बहुत ही कम थे..आप चुन-चुन कर कैसे तकरीबन 6 करोंड़ आदमी को बाहर फेंक सकते है?..कुछ हालात के बस और कुछ अपनी बेवकूफियों की वजह से जिन लोगों ने सरहद पार किया उनकी हालात आज भी किसी से छुपी नहीं है..?फिर हम ये उम्मीद करें कि गांधी ने उनके नरसंहार का फतवा क्यो नहीं दिया..?ये महज संयोंग नहीं है कि गांधी की आलोचना भी तभी से ज्यादा शुरु हुई है जब से मुल्क में एक खास तरह की विचारधारा ने जड़ जमाना शुरु किया है। दूसरी बात की जब से दलितों में चेतना आई है..अम्वेदकर की तारीफ मतलब, गांधी को गाली देना बन गया है। यह एक तरह से मौजूदा कांग्रेस पार्टी पर परोक्ष रुप से हमला भी है...क्योंकि इसी ने बड़े वाहियात तरीके से पिछले 60 सालों से ब्रांड गांधी को बेचा है। जहां तक पूंजीवादियों के समर्थन देने की बात हैं..गांधी जानते थे कि हजारों लेयर में बंटे इस देश की जमीन क्रान्ति के लिए उर्वर नहीं है..और आजादी के आंदोलन को चलाने के लिए एक असरदार मध्यमवर्ग को साथ में लेना जरुरी था। और सियासी गतिविधियों के लिए धन की भी आवश्यकता थी। और गांधी ने यहीं किया। सबसे बड़ी बात यह थी गांधी का उद्येश्य उस समय आजादी था..भावी सरकार का चरित्र नहीं। लेकिन बात करें सुभाष और भगत सिहं की..तो उन लोगों ने सत्ता हाथ में आने से पहले ही भावी प्रशासन का रुपरेखा दिमाग में बना ली थी..और जाहिरा तौर पर..वो समाजवादी माडल था। और इसी बात को लेकर आज के वामपंथी आज इतराते फिरते हैं कि सुभाष और भगत उनके विचारों के आदमी थे। लेकिन इन वामपंथियों से पूछा जाना चाहिए कि संघियों की तरह उस वक्त ये लोग आजादी की लड़ाई के लिए क्या कर रहे थे तो शायद इनके पास कहने के लिए कुछ भी न हों।
गांधी ने रणनीति के तहत चौराचौरी के वक्त आंदोलन को वापस ले लिया था। गांधी ने जब देखा कि आंदोलन अपनी धार खोता जा रहा है तो उन्होने अपनी उर्जा रचनात्मक कामों की तरफ मोड़ दिया। गांधी ने बड़े धैर्य से आंदोलन को धारदार बनाया था..और आधुनिक संचार के सारे साधनों का चतुराई से इस्तेमाल किया। अखवार, चिट्ठियां, भाषण, पर्चे सभी का इस्तेमाल गांधी ने किया। इस लेख का य़े मकसद नहीं कि भगत सिंह या सुभाष बाबू को कमतर आंका जाए..उनका योगदान था लेकिन वो सर्वांगीन नहीं था। गांधी या सुभाष की तुलना के लिए कोई भी लेख छोटा साबित हो सकता है..विशेषकर तब जब विश्लेषण के लिए आपने उस एतिहासिक पात्र को चुना हो जो संभवत पिछली सदीं में सबसे ज्यादा वार विश्लेषित किया गया हो। भगत सिंह का बेहतरीन आना बाकी था..वो बेवक्त दुनिया से चले गए..लेकिन अपनी कार्यशैली का संकेत तो वो छोड़ ही गए थे।सुभाष बाबू का बेहतरीन ये था कि उन्होने मुल्क की आजादी के लिए बुलंद हौसलों के साथ आरपार की एक प्रशंसनीय लड़ाई लड़ी.. लेकिन सवाल यह है कि अगर गांधी अगर सीन में न भी होते तो क्या सुभाष या भगतसिंह सिर्फ हथियारों के बल पर आजादी ले लेते... अगर हां तो क्या वो आजादी सबको समाहित करने वाली होती..यहीं वो सवाल है जो फिर से हमें गांधी की प्रसांगिकता की याद दिलाता है।

5 टिप्‍पणियां:

Neeraj Rohilla ने कहा…

बड़ा सुंदर आलेख, पढ़कर मन प्रसन्न हो गया |

कृपा कर वर्ड वेरीफिकेशन हटायें, टिपण्णी देने में तकलीफ होती है :-)

अफ़लातून ने कहा…

सही विश्लेषण । 'सत्य के प्रयोग' करने वाले व्यक्ति ने कहा कि आपको एक विषय पर मेरे दो दृश्टिकोण वाले उद्धरण मिलें तो बाद वाले को सही मानें। इसलिए यह न भूलें कि मृत्यु से कुछ साल पहले से ही वे सिर्फ़ सवर्ण-अवर्ण विवाह में ही जाते थे।
- अफ़लातून

Mired Mirage ने कहा…

बहुत अच्छा लेख है। मेरे विचार से तीनों का अपना अपना महत्व था। किसी को कम या अधिक नहीं आँका जा सकता। सबने अपनी तरह से देशवासियों को झकझोड़ा और ऐसी स्थिति पैदा की कि भारत पर अंग्रेजों को शासन करना असंभव लगने लगा।
घुघूती बासूती

मिथिलेश श्रीवास्तव ने कहा…

जनाब, गांधी, नेहरू, सुभाष, भगत सिंह ...सब चले गए। सबकी अपनी अपनी खासियत रही और सबके अपनी-अपनी सोच है। दीगर बात ये है िक हम उनकी तुलना करने की बजाय उनके विचारों की तह में जाकर देखें कि हकीकत क््या थी। और आज के समय में उनकी बातें कितनी प््रासंगिक हैं...जो जो बातें अच््छी लगें वो अपना लें और जो नहीं उनको छोड़ दें. हालांकि ऐसा कहना जितना आसान है, करना उतना ही मुिश््कल। अगर इनमें से किसी एक शख््स की एक भी अच््छी बात अपनी िजंदगी में हम उतार लेते हैं तो उनके लिए यही अच््छा होगा...गांधी जी ने तो खुलेआम कहा भी था कि प््रयोग करो, जरूरी नहीं कि मेरी बात सही ही हो, अगर तुम््हारी बात सही ठहरे तो उसे अपना लो...खैर, लेख अच््छा है..

राजीव कुमार ने कहा…

सुशांत जी, गांधी, नेहरू, जिन्ना या फिर भगत सिंह के योगदान के बारे में काफी कुछ किताबों में पढ़ा है। लेकिन संक्षेप में इतना बढ़िया विश्लेषण कहीं भी पढ़ने को नहीं मिला। वो भी हिंदी भाषा में। दिन-रात नेट पर आंकड़ों से खेलता हूं। विश्लेषणों से रूबरू होता हूं। लेकिन शायद ही कोई वाम या दक्षिणपथी लेखक इतना सटीक व्याख्या करता मिला। Excellent....Best Wishes.