Friday, July 3, 2009
गांव लौट जाना चाहता हूं
मित्रों को मजाक लगता है.कुछ ज्यादा संवेदनशील मित्र इसे काम का दबाव मानते हैं.कुछ ऐसे भी हैं जो इसे बकवास करार देंगे.दरअसल मेरी ख्वाहिश ही कुछ ऐसी है जिसे लोगबाग गंभीरता से नहीं लेते.मैं वाकई गांव वापस लौट जाना चाहता हूं.इसके पीछे कोई ठोस वजह नहीं है.शुरू शुरू में ये ख्याल एक लहर की तरह आया.लेकिन अब गाहे बिगाहे परेशान करता है.दावे के साथ कह सकता हूं कि इस ख्याल की वजह नास्टेल्जिया नहीं है.गांव में जाकर कोई सामाजिक आर्थिक क्रांति करने का इरादा भी नहीं.बस गांव में जाकर बसना चाहता हूं.हालाकि वहां से कभी उजड़ा हूं, ऐसा भी नहीं.मैं तो शुद्ध कस्बाई हूं.लेकिन गांव करीब था इसलिए आना जाना लगा रहा.अब नए सीरे से गांव में बसने को जी चाहता है.वैसे ही जैसै मेरे पूर्वज बसे होंगे पहली बार.मैं जानता हूं ये फैसला इतना आसान नहीं. जीवन यापन का सवाल एक बार फिर मुंह बाए खड़ा होगा.इसके अलावा कई साल दिल्ली जैसे शहर में गुजारने के बाद ठेठ गांव में जाकर रहने की अपनी चुनौतियां होंगी.दिक्कतें होंगी इतना जानता हूं.फैसले में हो रही देरी भी इसी वजह से है.लेकिन सच्चाई यही है कि इस शहर में होने की एक भी वजह मेरे पास नहीं है.किसी भी दूसरे प्रवासी की तरह इस शहर ने मेरी भी पहचान सालों पहले खत्म कर दी थी.पढाई लिखाई तक तो फिर भी ठीक था, लेकिन अब इस शहर का क्या करूं.कुछ ना करते करते एक दिन मैने खुद को इस शहर में रोजगार करते पाया.इस शहर ने मुझे रोजगार दिया है और इसके एवज में मुझसे हरेक चीज ले ली है जो मेरी अपनी होती थी.यहां तक कि मेरी आदतें भी.कई महिने गुजर गए, गालिब को नहीं पढ़ा.श्मशेर मेरे सामने धूल फांकते उदास बैठे रहते है.कमोबेश मेरे घर में कुछ सालों से उपेक्षा के ऐसे ही शिकार हैं मुक्तिबोध रघुवीर सहाय धूमिल और मजाज.यकीन मानिए जिन्दगी बड़ी ही नीरस हो चली है.कुछ इसकी वजह मेरे काम का अपना स्वभाव भी है.लेकिन काम करने की मजबूरी समझ में नहीं आती.किसी फरमाबर्दार नौकर की तरह अपने काम को अंजाम देता हूं.मैं भी किसी शाह का मुसाहिब बन के इतराना और काम से मुंह चुराना चाहता था.कर नहीं पाया.इसलिए अपने काबिल मित्रों की शिकायत भी नहीं करता.मेहनत के बल पर अपने आर्थिक हालात बेहतर करने का हौसला देर तक कायम रखा, लेकिन अक्सर ऐसा नहीं होता.मेरे मामले में भी नहीं हुआ.नतीजा, फाकेमस्ती ना सही लेकिन गुरबत का दौर आज भी जारी है.अपने सुबहो शाम अपने काम के नाम करके, गधा बन गया हूं.हालाकि इसी काम की बदौलत कई गधे सफलता के शिखर पर हैं.खैर ये तो अपनी अपनी काबिलियत और किस्मत की बात है.मेरे दिन नहीं फिरे, ना सही.लेकिन तब इस शहर में होने का औचित्य क्या है.खड़ा हूं आज भी रोटी के चार हर्फ लिए...सवाल ये है कि किताबों ने क्या दिया मुझको.कुछ नहीं.एक बेहद अतार्किक और बेमकसद सी जिन्दगी.दोस्तों इसी जिन्दगी से भागना चाहता हूं.पहली बार हालात से भागना चाहता हूं.मैं गांव लौट जाना चाहता हूं,अपने खेतों में जहां किसी ने, कभी गुलाब की फसल उगाने की कामना की थी.यकीन कीजिए गुलाब, खबरों से ज्यादा अहमियत रखते हैं (घोर निराशा के मूड में)
Friday, May 1, 2009
मुद्दाविहीन चुनाव, लहर और जनसरोकार
अभी एक टेलिविजन डेवेट देख रहा था जिसमें राजदीप, आशुतोष. योगेंद्र यादव और श्रवण गर्ग भाग ले रहे थे। जाहिरन मुद्दा लोकसभा चुनाव ही था और बात घूमफिर वहीं आ अटकी थी कि चुनाव के बाद क्या होनेवाला है। एक बिन्दु पर लगभग सभी सहमत थे कि ये चुनाव मुद्दाविहीन चुनाव है और इसी वजह से किसी तरह की अटकलवाजी गलत हो सकती है। राजदीप ने कहा कि चुनाव में थोड़ाबहुत मुद्दा है तो वो महंगाई और आर्थिक मंदी है लेकिन मूलत: बड़े पैंमाने पर ये चुनाव लोकल इश्यूज पर लड़े जा रहे हैं। बिहार का मुद्दा अलग है कर्नाटक का अलग, यहां तक कि उत्तरी और दक्षिणी मुम्बई का मुद्दा भी अलग-अलग है। एक विद्वान का कहना था कि ये भी अपने आप में चिंता की बात है कि राजनैतिक परिपक्वता की ओर अग्रसर इतना बड़ा मुल्क एक राष्ट्रीय मुद्दा तक नहीं खोज पाया है। लेकिन इसके उलट भी कई तर्क हैं जो काफी मजबूत हैं।
ये कहना कि देश में राष्ट्रीय मुद्दों का अकाल हो गया है, सच से मुंह चुराना होगा। जिस देश की एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती हो, जिस देश में सिर्फ सस्ता अनाज उपलब्ध करवा कर वोट बटोरे जा सकते हों वहां मुद्दों का अभाव होना दरअसल कुछ खतरनाक इशारा करता है। सच्चाई तो ये है कि हमारे पास उतना कद्दावर नेतृत्व नहीं है जो कई बड़े मुद्दे को अपनी शख्सियत और पार्टी की विचारधारा में समेट सके। एक मुल्क के तौर पर यह हमारी बड़ी नाकामी है कि हमें औसत किस्म के सियासतदानों में से एक को अपना रहनुमा चुनना है।
दूसरी बात ये आजादी के कुछ ही दिनों के बाद से जब हमारे सपने टूटकर बिखरने लगे थे, हमने नकली मुद्दों की तरफ चुनाव को झोंकना शुरु कर दिया। जबसे हमने लहरों के आधार पर अपना वोट देना शुरु किय़ा हमारे नेतृत्व का दिवालियापन सामने आने लगा। मुझे लगता है कि ये साल इकहत्तर में भी हुआ जब हमने बंग्लादेश युद्ध के बाद फिर से इंदिराजी को चुना था, यहीं सन 84 में भी हुआ जब उनकी मौत के बाद राजीव गांधी गद्दीनशीं हुए थे। ऐसा सन् ൯൧ में भी हुआ और उसके बाद तो ये ൯൯ तक हुआ। दरअसल, हमारी चालाक सियासी पार्टियों ने जरुरी मुद्दों से हमें भटकाने के लिए लहर का ढ़ोंग रचा ताकि हम सवाल उठाना बंद कर दें। ये चुनाव इस मायने में काफी अच्छा है जब हम लाख बहकावे के बावजूद अपने मुद्दों के आधार पर-चाहे वो कईयों की नजर में कितने ही तुच्छ क्यों न हों-वोट कर रहे हैं।
दूसरी बात जो अहम है वो ये कि राष्ट्रीय मुद्दे या लहर जैसी बात बड़ी पार्टियों के हक में जाती है। यहां ये लिखने का मतलब बड़ी पार्टियों का विरोध नहीं है बल्कि इतना जरुर है कि छोटी पार्टियों के आने से लोकतंत्र ज्यादा मजबूत, जनापेक्षी और जवाबदेह बना है। हलांकि शुरुआती दौर में इसमें कुछ गिरावटें देखने को मिल सकती है लेकिन ऐसा तो हर विकासशील व्यवस्था में अनिवार्य होता है। हमें याद है कि कांग्रेस की बहुमत के जमाने में किस तरह सूबों के काबिल और जनाधारवाले नेताओं को ऊपर उठने का मौका नहीं मिलता था। आज ऐसी स्थिति नहीं है। हां, इससे बड़ी पार्टियां भी सीख ले रही है कि विराट और आभामंडल से घिरा हुआ नेतृत्व अब काबिल और लोकप्रिय नेताओं की अनेदेखी से बच रहा है।
कुल मिलाकर चुनाव ऐसी डगर पर चल पड़ा है जहां बड़े करीने से गढ़े गए लोकलुभावन चेहरे और नकली मुद्दों-जिन्हे राष्ट्रीयता का चोला पहना दिया जाता था-की अहमियत कम हुई है। हमारे यहां राष्ट्रीय छवि, मुद्दों और अपील को बड़ी चतुराई से घालमेल कर देने की परंपरा रही है, और वोटर इसबार इससे मुक्त होता हुआ दिखता है। राष्ट्रीय अपील का मतलब खूबसूरत चेहरे, खानदान, भावुकता और उन्माद न होकर जनसरोकारों की बात करनेवाली आवाज होनी चाहिए-जो फिलहाल तो नहीं दिख रही, लेकिन हो तो बेहतर है।
ये कहना कि देश में राष्ट्रीय मुद्दों का अकाल हो गया है, सच से मुंह चुराना होगा। जिस देश की एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती हो, जिस देश में सिर्फ सस्ता अनाज उपलब्ध करवा कर वोट बटोरे जा सकते हों वहां मुद्दों का अभाव होना दरअसल कुछ खतरनाक इशारा करता है। सच्चाई तो ये है कि हमारे पास उतना कद्दावर नेतृत्व नहीं है जो कई बड़े मुद्दे को अपनी शख्सियत और पार्टी की विचारधारा में समेट सके। एक मुल्क के तौर पर यह हमारी बड़ी नाकामी है कि हमें औसत किस्म के सियासतदानों में से एक को अपना रहनुमा चुनना है।
दूसरी बात ये आजादी के कुछ ही दिनों के बाद से जब हमारे सपने टूटकर बिखरने लगे थे, हमने नकली मुद्दों की तरफ चुनाव को झोंकना शुरु कर दिया। जबसे हमने लहरों के आधार पर अपना वोट देना शुरु किय़ा हमारे नेतृत्व का दिवालियापन सामने आने लगा। मुझे लगता है कि ये साल इकहत्तर में भी हुआ जब हमने बंग्लादेश युद्ध के बाद फिर से इंदिराजी को चुना था, यहीं सन 84 में भी हुआ जब उनकी मौत के बाद राजीव गांधी गद्दीनशीं हुए थे। ऐसा सन् ൯൧ में भी हुआ और उसके बाद तो ये ൯൯ तक हुआ। दरअसल, हमारी चालाक सियासी पार्टियों ने जरुरी मुद्दों से हमें भटकाने के लिए लहर का ढ़ोंग रचा ताकि हम सवाल उठाना बंद कर दें। ये चुनाव इस मायने में काफी अच्छा है जब हम लाख बहकावे के बावजूद अपने मुद्दों के आधार पर-चाहे वो कईयों की नजर में कितने ही तुच्छ क्यों न हों-वोट कर रहे हैं।
दूसरी बात जो अहम है वो ये कि राष्ट्रीय मुद्दे या लहर जैसी बात बड़ी पार्टियों के हक में जाती है। यहां ये लिखने का मतलब बड़ी पार्टियों का विरोध नहीं है बल्कि इतना जरुर है कि छोटी पार्टियों के आने से लोकतंत्र ज्यादा मजबूत, जनापेक्षी और जवाबदेह बना है। हलांकि शुरुआती दौर में इसमें कुछ गिरावटें देखने को मिल सकती है लेकिन ऐसा तो हर विकासशील व्यवस्था में अनिवार्य होता है। हमें याद है कि कांग्रेस की बहुमत के जमाने में किस तरह सूबों के काबिल और जनाधारवाले नेताओं को ऊपर उठने का मौका नहीं मिलता था। आज ऐसी स्थिति नहीं है। हां, इससे बड़ी पार्टियां भी सीख ले रही है कि विराट और आभामंडल से घिरा हुआ नेतृत्व अब काबिल और लोकप्रिय नेताओं की अनेदेखी से बच रहा है।
कुल मिलाकर चुनाव ऐसी डगर पर चल पड़ा है जहां बड़े करीने से गढ़े गए लोकलुभावन चेहरे और नकली मुद्दों-जिन्हे राष्ट्रीयता का चोला पहना दिया जाता था-की अहमियत कम हुई है। हमारे यहां राष्ट्रीय छवि, मुद्दों और अपील को बड़ी चतुराई से घालमेल कर देने की परंपरा रही है, और वोटर इसबार इससे मुक्त होता हुआ दिखता है। राष्ट्रीय अपील का मतलब खूबसूरत चेहरे, खानदान, भावुकता और उन्माद न होकर जनसरोकारों की बात करनेवाली आवाज होनी चाहिए-जो फिलहाल तो नहीं दिख रही, लेकिन हो तो बेहतर है।
Wednesday, September 10, 2008
नक्शे पे अब कुछ नज़र नही आता-बाढ़ है या कि बिहार है क्या है ?

भूतनाथ वाया राजीव थेपरा
(िजसने जहां से देखा...मंजर उसे उदास कर गया। बस एक तकलीफ ही है जिसे हम बांट रहे है...आपस मेें... अपनों से । इस उदासी को भी आपसे बांट रहा हूं, राजीव जी से बगैर पूछे। और इस आशा के साथ कि दुख की ये रात भी आखिरकार ढ़ल जाएगी)
कई दिनों से बिहार के ऊपर उड़ रहा हूँ !बहुत सारे लोगों की तरह मैं भी यही सोच रहा हूँ कि क्या किया जाए , मगर जैसे कि कुछ भी करने का कोई बहाना नहीं होता,वैसे ही कुछ न करने के सौ बहाने होते हैं !सो जैसे धरती के लोग जैसे अपने घर के दडबों में कैद हैं,वैसे ही मैं भी बेशक खुले आसमान में तैर रहा हूँ ,मगर हूँ एक तरह से दड्बो में ही ....!चारों और जो मंज़र देख रहा हूँ ,मेरी रूह कांप रही है .....पानी का ऐसा सैलाब ....तिनकों की तरह बहते लोग ,पशु और अन्य वस्तुएं ......बेबसी,लाचारी,वीभत्सता,आंसू,कातारता,पीडा,यंत्रणा.....और ना जाने क्या-क्या ...! उपरवाला दुनिया बनाकर क्या यही सब देखता रहता है?सीधे शब्दों में बात कहानी मुश्किल हो रही है,थोड़ा बदलकर कहता हूँ ......
ये जो मंज़र-ऐ विकराल है ,क्या है
हर तरफ़ हश्र है,काल है ,क्या है ?
पानी-ही-पानी है उफ़ ,हर जगह ,
कोशी क्यूँ बेकरार है ,क्या है ?
डबडबाई है आँख हर इंसान की
बह रही है ये बयार है ,क्या है?
लीलती जाती है नदी सब कुछ को
गुस्सा क्यूँ इस कदर है,क्या है ?
मुझको अपने ही रस्ते चलने दो
ख्वाहिशें-आदम तो दयार है ,क्या है ?
मैं तो सबको ही भरती चलती हूँ
तुम बनाते हो मुझपे बाँध ,क्या है ?
मुझको हंसने दो खिलखिलाने दो
मुझको छेडो ना इस कदर,क्या है ?
कोई आदम को जा कर समझाओ
धरती का चाक गरेबां है ,क्या है ?
हर तरफ़ खौफ से बेबस आँखें हैं
मौत का इंतज़ार है, क्या है ?
थाम लो ना इन सबको बाहों में
कर रहे जो ये फरियाद है, क्या है ?
कोई आदम का मुकाम समझाओ
हर कोई क्यूँ बेकरार है ,क्या है ?
जो भी बन पड़ता है इनको दे आओ
वरना खुदाई भी शर्मसार है ,क्या है ?
किसने छीना है इनका चैनो-सुकून
वो नेता है, अफसरान है क्या है ?
इनके हिस्से का कुछ भी मत खा जाना
दोजख भी जाओगे तो पूछेंगे, क्या है ?
नक्शे पे अब कुछ नज़र नही आता
बाढ़ है या कि बिहार है ,क्या है ?
साल- दर-साल ये घटना होती है ।होती चली आ रही है ,हजारों लोग हर साल असमय काल-कलवित हो रहे है ,मगर ऐसी लोमहर्षक घटनाओं में भी तो अनेकानेक लोगों की तो चांदी ही कट रही है ! लोग ज़रूरत का सामान भी कई गुना ज्यादा महँगा बेच रहे हैं !नाव वालों का भाव शेयरों की तरह चढा हुआ है ! बहुत सारे राहतकर्मी ग़लत कार्यों में लगे हुए हैं !राहतराशि और सामान बाँटने वाले बहुत सारे लोग यह सब कुछ बीच में ही हजम कर जा रहे है !यह तो गनीमत है कि ऐसे मौकों पर अधिसंख्य लोगों में मानवता कायम रहती है ,सो बहुत काम सुचारू रूप से हो जाता है ,वरना तो पीड़ित लोगों का भगवान् ही मालिक होता !!मैं दंग हूँ कि ऐसे आपातकाल में भी कुछ लोग ऐसे निपट स्वार्थी कैसे हो सकते है ,जो शर्म त्याग कर इन दिनों भी गंदे और नीच कर्मों में ही रत रहे !!हे भगवान् इन्हे माफ़ कभी मत करना !
Saturday, September 6, 2008
कौशल्या देवी(मां) को श्रद्धांजली
प्रभात रंजन
कभी कभी सोचता हूं कि चन्द्रशेखर भाई जैसे लोग आखिर कैसे बनते हैं? सीवान जैसे शहर के एक दूर दराज गांव में पैदा होने वाला लड़का... कद-काठी समान्य...बाप- दादा की दी हुई कोई जागीर नहीं... लेकिन फिर भी ऐसा असाधारण व्यक्तित्व । अन्दर और बाहर दोनो की सादगी , जीवट और स्वाभिमान... चन्द्रशेखर भाई में कई ऐसी चीजें थी जो हम जैसो को जेएनयू के जमाने से प्रभावित करती थी। उनकी हत्या के बाद के सालों में धीरे - धीरे मैने समझा कि चन्द्रशेखर भाई को उनकी तालीम ने नहीं बल्कि मां ने बनाया था । अपने इकलौते बेटे की मृत्यु के बावजूद जो टूटे नहीं ऐसी औरत ही चन्द्रशेखर की मां हो सकती थी । चन्द्रशेखर भाई की हत्या के समय मैं सीवान में ही था । उनकी हत्या का विरोध करने जेएनयू के कुछ छात्र सीवान आए थे । तब के सीवान में शहाबुद्दीन का आतंक इतना था कि जेएनयू के वो छात्र जो सीवान से थे , इस विरोध सभा में शामिल नहीं हुए । खैर मैं उनकी कायरता का बखान नहीं करना चाहता । बस एक उम्रदराज, अकेली औरत के हिम्मत का जिक्र करना चाहता हूं। देश के गृहमंत्री ने मुआवजे के तौर पर एक लाख रूपए की रकम कौशल्या देवी को देने की पेशकश की । इकलौते बेटे के जाने के बाद वो रूपए एक अकेली औरत के लिए बड़ा सहारा बन सकते थे। लेिकन मां ने रूपए लेने से इंकार कर दिया । अगर कुछ मांगा तो बस इतना कि उनके बेटे के कातिल को सजा दी जाए । खैर राजनीतिक कारणों से इन्द्रजीत गुप्ता ऐसा नहीं कर सकते थे , नहीं किया । लेकिन कौशल्या देवी ने हार नहीं मानी। विरोध की जिस मसाल को चन्द्रशेखर भाई ने सीवान में जलाया उसे आगे बढ़कर उन्होने थाम लिया । िजसका नाम लेते हुए भी सीवान को लोग डरते थे , उसके खिलाफ उन्होने मोर्चा संभाल लिया । एक और प्रशासन और सरकार से शहाबुद्दीन को सजा देने की मांग करती रही तो दूसरी और हर मंच से शहाबुद्दीन को चुनौती देती रही कि अगर दम है तो मुझे मार कर दिखा । अपने लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए , अधिकार दिलाने के लिए , विधान सभा का चुनाव भी लड़ा । कौशल्या देवी सीवान में शहाबुद्दीन के खिलाफ प्रतिरोध की दीवार बन गईं । एक अटल , मजबुत दीवार । अब ये दीवार नहीं रही। दो दिन पहले कौशल्या देवी का देहांत हो गया है। न्याय के लिए ग्यारह साल लड़ने के बाद आखिरकार मां ने आंखे बंद कर ली । जिन्दगी जैसे अभावग्रस्त रही , मौत भी वैसी ही ...चुपचाप। आइए कोशल्या देवी को श्रद्धांजली दे और ईश्वर से प्रार्थना करे कि हमारे समाज में बहुत सारी कोशल्या देवी हो । क्योंकि कौशल्या ही चन्द्रशेखर को बनाती है।
कभी कभी सोचता हूं कि चन्द्रशेखर भाई जैसे लोग आखिर कैसे बनते हैं? सीवान जैसे शहर के एक दूर दराज गांव में पैदा होने वाला लड़का... कद-काठी समान्य...बाप- दादा की दी हुई कोई जागीर नहीं... लेकिन फिर भी ऐसा असाधारण व्यक्तित्व । अन्दर और बाहर दोनो की सादगी , जीवट और स्वाभिमान... चन्द्रशेखर भाई में कई ऐसी चीजें थी जो हम जैसो को जेएनयू के जमाने से प्रभावित करती थी। उनकी हत्या के बाद के सालों में धीरे - धीरे मैने समझा कि चन्द्रशेखर भाई को उनकी तालीम ने नहीं बल्कि मां ने बनाया था । अपने इकलौते बेटे की मृत्यु के बावजूद जो टूटे नहीं ऐसी औरत ही चन्द्रशेखर की मां हो सकती थी । चन्द्रशेखर भाई की हत्या के समय मैं सीवान में ही था । उनकी हत्या का विरोध करने जेएनयू के कुछ छात्र सीवान आए थे । तब के सीवान में शहाबुद्दीन का आतंक इतना था कि जेएनयू के वो छात्र जो सीवान से थे , इस विरोध सभा में शामिल नहीं हुए । खैर मैं उनकी कायरता का बखान नहीं करना चाहता । बस एक उम्रदराज, अकेली औरत के हिम्मत का जिक्र करना चाहता हूं। देश के गृहमंत्री ने मुआवजे के तौर पर एक लाख रूपए की रकम कौशल्या देवी को देने की पेशकश की । इकलौते बेटे के जाने के बाद वो रूपए एक अकेली औरत के लिए बड़ा सहारा बन सकते थे। लेिकन मां ने रूपए लेने से इंकार कर दिया । अगर कुछ मांगा तो बस इतना कि उनके बेटे के कातिल को सजा दी जाए । खैर राजनीतिक कारणों से इन्द्रजीत गुप्ता ऐसा नहीं कर सकते थे , नहीं किया । लेकिन कौशल्या देवी ने हार नहीं मानी। विरोध की जिस मसाल को चन्द्रशेखर भाई ने सीवान में जलाया उसे आगे बढ़कर उन्होने थाम लिया । िजसका नाम लेते हुए भी सीवान को लोग डरते थे , उसके खिलाफ उन्होने मोर्चा संभाल लिया । एक और प्रशासन और सरकार से शहाबुद्दीन को सजा देने की मांग करती रही तो दूसरी और हर मंच से शहाबुद्दीन को चुनौती देती रही कि अगर दम है तो मुझे मार कर दिखा । अपने लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए , अधिकार दिलाने के लिए , विधान सभा का चुनाव भी लड़ा । कौशल्या देवी सीवान में शहाबुद्दीन के खिलाफ प्रतिरोध की दीवार बन गईं । एक अटल , मजबुत दीवार । अब ये दीवार नहीं रही। दो दिन पहले कौशल्या देवी का देहांत हो गया है। न्याय के लिए ग्यारह साल लड़ने के बाद आखिरकार मां ने आंखे बंद कर ली । जिन्दगी जैसे अभावग्रस्त रही , मौत भी वैसी ही ...चुपचाप। आइए कोशल्या देवी को श्रद्धांजली दे और ईश्वर से प्रार्थना करे कि हमारे समाज में बहुत सारी कोशल्या देवी हो । क्योंकि कौशल्या ही चन्द्रशेखर को बनाती है।
Wednesday, August 20, 2008
पतझड़ के बाद का दुख
सुनन्दा राय
-इलाहाबाद से ये कविताएं सुनन्दा ने भेजी है... एक हल्के से संकोच के साथ । लिखा है - कच्चा पका सा कुछ लिखती हूं , जिसे मुमकिन है लोग, कविता की श्रेणी में ना रखे - लेकिन पूरी होने के बाद तो कविता स्वायत्त होती है जिस पर लिखने वाले का भी कोई जोर नहीं चलता ..... इसलिए अब पढ़ने वालों की राय ही मान्य होगी
(एक)
रोज टूटते हैं
पत्ते-
दरख्त नहीं मैं जानती हूं
पतझड़ के बाद का दुख ।
(दो)
सो जाती हूं तब
पैर दौड़ते हैं
तुम्हारे पीछे - पीछे ।
हाय री- गुड़िया रानी
कित्ता - कित्ता पानी ।
(तीन)
नुक्कड़ की दुकान से
दस रूपए का गुलाब खरीदकर
दिया उसने
और कहा - प्यार
वह एक शरीफ दुनियादार आदमी था।
(चार )
दो अंगुल की बुद्धि
मां की
चावल का पानी नापती रही
मैं दो अंगुल से देखती हूं
दुनिया
कितने पानी में ।
-इलाहाबाद से ये कविताएं सुनन्दा ने भेजी है... एक हल्के से संकोच के साथ । लिखा है - कच्चा पका सा कुछ लिखती हूं , जिसे मुमकिन है लोग, कविता की श्रेणी में ना रखे - लेकिन पूरी होने के बाद तो कविता स्वायत्त होती है जिस पर लिखने वाले का भी कोई जोर नहीं चलता ..... इसलिए अब पढ़ने वालों की राय ही मान्य होगी
(एक)
रोज टूटते हैं
पत्ते-
दरख्त नहीं मैं जानती हूं
पतझड़ के बाद का दुख ।
(दो)
सो जाती हूं तब
पैर दौड़ते हैं
तुम्हारे पीछे - पीछे ।
हाय री- गुड़िया रानी
कित्ता - कित्ता पानी ।
(तीन)
नुक्कड़ की दुकान से
दस रूपए का गुलाब खरीदकर
दिया उसने
और कहा - प्यार
वह एक शरीफ दुनियादार आदमी था।
(चार )
दो अंगुल की बुद्धि
मां की
चावल का पानी नापती रही
मैं दो अंगुल से देखती हूं
दुनिया
कितने पानी में ।
Thursday, August 14, 2008
मारे गए गुलफाम
प्रभात रंजन
बात इतनी सी थी कि, दीवार गिरने से, एक बकरी मारी गई थी । राजा के इंसाफ का तकाजा था कि बकरी के जान के बदले में दोषी आदमी को फांसी दी जाए । लेकिन ये भी गजब हुआ कि भिश्ती से लेकर कोतवाल तक सभी बारी- बारी बेगुनाह साबित हुए । अब बेचारा राजा इंसाफ करे भी तो कैसे करे । गहरे दुख में डूब गया राजा । आखिरकार राजा को बचाया मंत्री ने ... एक तरकीब बताई - किसी तगड़े आदमी के गले में डाल दो फांसी का फंदा , क्योंिक इंसाफ होना जरूरी है । ये कहानी लोगो ने पहले से सुन रखी थी ,इसलिए खुश थे क्योंकि आखिरकार फंदा मोटे - तगड़े आदमी के गले से उतरकर लालची राजा के गले में ही जाना था । बैकुठ के लालच में राजा को मारा जाना था । लेकिन कहानी ने छल किया ( बाद में कुछ लोगो ने कहा कि ये दरअसल समय का छल था)। तगड़े आदमी के ईशारे पर राजा ने भीड़ की तरफ फंदा उछाला । कई -कई फंदे एक साथ । कोई समझे तब तक कस गई रस्सी, गर्दन के चारो ओर। कई - कई गर्दन एक साथ । पलक झपकते झूल गए जिस्म हवा में । प्रतिरोध का कोई मौका नहीं , संभलने का कोई संकेत नहीं । तब राजा ने प्रजा की ओर देखा और शब्दों को चबाते हुए कहा कि - आइंदा हमारे राज्य में कोई बकरी नहीं मरनी चाहिए । जनता मौन - स्तब्ध । मरघट सा सन््नाटा काफी देर तक फैला रहा । बाद में, वहां मौजूद कुछ लोगो ने बताया कि इस नरसंहार के बाद राजा ने िमठाईयां बांटी । चुटकुले सुनाए और लोगो को हॅसने की राय दी । अब लोग हॅसने का प्रयास कर रहे है । हम कल भी हॅसेगे.
धर्म की आंच पर कश्मीर सुलग रहा है .... नोएडा के कुछ किसान परिवारों में मातम का माहौल है... संसद में कुछ दिन पहले ही लोकतंत्र को निर्वस्त्र किया गया है ... कुछ लोगो पर बेहद जुल्म हुआ है .... मेरे साथी , मेरे पड़ोसी जार - जार रो रहे है ... बावजूद इसके हम हॅसेगे। हॅसना सेहत के लिए बेहतर है । देश की आजादी की सालगिरह मुबारक दोस्तो । राजा अमर रहे ।
बात इतनी सी थी कि, दीवार गिरने से, एक बकरी मारी गई थी । राजा के इंसाफ का तकाजा था कि बकरी के जान के बदले में दोषी आदमी को फांसी दी जाए । लेकिन ये भी गजब हुआ कि भिश्ती से लेकर कोतवाल तक सभी बारी- बारी बेगुनाह साबित हुए । अब बेचारा राजा इंसाफ करे भी तो कैसे करे । गहरे दुख में डूब गया राजा । आखिरकार राजा को बचाया मंत्री ने ... एक तरकीब बताई - किसी तगड़े आदमी के गले में डाल दो फांसी का फंदा , क्योंिक इंसाफ होना जरूरी है । ये कहानी लोगो ने पहले से सुन रखी थी ,इसलिए खुश थे क्योंकि आखिरकार फंदा मोटे - तगड़े आदमी के गले से उतरकर लालची राजा के गले में ही जाना था । बैकुठ के लालच में राजा को मारा जाना था । लेकिन कहानी ने छल किया ( बाद में कुछ लोगो ने कहा कि ये दरअसल समय का छल था)। तगड़े आदमी के ईशारे पर राजा ने भीड़ की तरफ फंदा उछाला । कई -कई फंदे एक साथ । कोई समझे तब तक कस गई रस्सी, गर्दन के चारो ओर। कई - कई गर्दन एक साथ । पलक झपकते झूल गए जिस्म हवा में । प्रतिरोध का कोई मौका नहीं , संभलने का कोई संकेत नहीं । तब राजा ने प्रजा की ओर देखा और शब्दों को चबाते हुए कहा कि - आइंदा हमारे राज्य में कोई बकरी नहीं मरनी चाहिए । जनता मौन - स्तब्ध । मरघट सा सन््नाटा काफी देर तक फैला रहा । बाद में, वहां मौजूद कुछ लोगो ने बताया कि इस नरसंहार के बाद राजा ने िमठाईयां बांटी । चुटकुले सुनाए और लोगो को हॅसने की राय दी । अब लोग हॅसने का प्रयास कर रहे है । हम कल भी हॅसेगे.
धर्म की आंच पर कश्मीर सुलग रहा है .... नोएडा के कुछ किसान परिवारों में मातम का माहौल है... संसद में कुछ दिन पहले ही लोकतंत्र को निर्वस्त्र किया गया है ... कुछ लोगो पर बेहद जुल्म हुआ है .... मेरे साथी , मेरे पड़ोसी जार - जार रो रहे है ... बावजूद इसके हम हॅसेगे। हॅसना सेहत के लिए बेहतर है । देश की आजादी की सालगिरह मुबारक दोस्तो । राजा अमर रहे ।
Wednesday, July 23, 2008
जिसका गुन हरचरना गाता है....
मिथिलेश कुमार सिंह
आइए...भारतीय राजनीति के मछली बाजार
में...मैं आपका स्वागत करता हूं...हिचकिए मत...चले आइए...अगर आप शरीफ
हैं...इस बाजार से आपका पहले वास्ता नहीं पड़ा है...तो नाक पर रूमाल रख
लीजिए...सड़ांध है यहां...आप गश खाकर गिर सकते हैं...मुझे आदत है...मैं
आम आदमी हूं...इस बाजार के फरमान ही मेरी तकदीर तय करते हैं...मुझे कितना
कमाना है...कितना खाना है...कितना बोलना है...कितना लिखना है...सब यही
लोग बताते हैं....चौंकिए मत...हम गुलाम नहीं हैं...आजाद हैं...और ये जो
बाजार है ना साहब....इसे हमारे लोग संसद कहते हैं...इसमें हमारे नुमाइंदे
रहते हैं...कितने प्यारे चेहरे हैं...वो कहते हैं ना साहब के....
"सियासी आदमी की शक्ल तो प्यारी निकलती है...
मगर जब गुफ्तगू करता है चिंगारी निकलती है...
कुछ ऐसा ही है यहां....हम तो इसकी पूजा करते थे...लेकिन पिछले कुछ सालों
से हमारा इस मंदिर से भरोसा उठ गया...कुछ अजीब सा माहौल है यहां...पहले
मुद्दों पर बहस होती थी....आज बहस में से लोग मुद्दे निकालते हैं....चोर
हैं यहां...उचक्के हैं...दमड़ी के दलाल हैं सब...बच के ना रहे तो चमड़ी
भी उधेड़ लेंगे...देखा ना आपने....नोटों की गड्डियां....हमारे मंदिर
में...चलो साहब...इसी बहाने देश के करोड़ों लोगों ने करोड़ रूपया तो देख
लिया...नहीं तो सबसे बड़ी नोटों की गड्डी तो तभी दिखती हैं जब बाबू जी
बहन की शादी के लिए दहेज का पैसा घर लाते हैं...खैर संसद में चोर-उचक्के
बैठेंगे तो यही होगा ना...अरेरेरे...घबराइये मत...ये शोर तो यहां आम बात
है....ये शोर ना हो तो बाजार का फील ही नहीं होता...ऊंघने लगते हैं
लोग...देश जाए खड्डे में...बहस न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर...और यहां
सिर्फ उखाड़े गए गड़े मुर्दे...खींचा-तानी चलती रही...खूब कीचड़ उछाले
गए....अपनी पीठ ठोंकी गई...क्या करें साहब...अब सीना ठोंकने की किसी की
औकात नहीं रही...कैरेक्टर नहीं रहा ना साहब....सब अपने जुगाड़
में...सरकार गिरी तो अलाने का फायदा....नहीं गिरी तो फलाने का....देश गया
खड्डे में...शशिकला का बेटा कलेक्टर बनेगा...लोग मुस्कुरा रहे थे
साहब...बिजली नहीं है...पानी नहीं...पता नहीं बड़ा होगा भी या
नहीं....विदर्भ का है ना साहब...क्या पता...वो तो रोटी बेलता है...खेलने
वाले तो यहां बैठे हैं...सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं...सबकी 'पाइपलाइन'
में बड़े-बड़े प्रोजेक्ट हैं...पाइपलाइन समझते हैं ना....ये गड्डियां उसी
पाइपलाइन से आती हैं...खैर...दो दिन खूब मजा आया...दुश्मन दोस्त बन
गए....दोस्त दुश्मन बन गए....जिन घोड़ों को चार साल किसी ने घास नहीं
डाली...आज घुड़दौड़ के समय उन्होंने खूब नखरे दिखाए...जम के कलाबाजियां
खाईं....जब तक पेट नहीं भरा...हिनहिनाए नहीं....हमारा देश सेकुलर
है...हमें भी इन्हीं लोगों ने बताया...कौन सेकुलर हो कौन नहीं...यही हमें
बताते हैं...खैर साहब...शुरूआत विडंबना से हुई थी...खत्म भी वहीं से करते
हैं....विडंबना ये कि जो बहस मंहगाई और आत्महत्या के मुद्दे पर होनी
चाहिए थी...वो न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर हो रही थी...विदेश नीति आम
आदमी नहीं जानता भाई...उसे ये पता है कि प्याज और पेट्रोल मंहगा होगा तो
सरकार को वोट नहीं देना है...विडंबना ये कि देश के सम्मान का प्रतीक रहे
इस मंदिर में जेल से सवारियां आती हैं...विडंबना ये कि स्वस्थ बहस की
परंपरा दम तोड़ रही है...संसद में लहरा रही हैं नोटों की
गड्डियां....कितनी गिनाएं...कहां तक गिनोगे...छोड़ो साहब...चलो...पेप्सी
वाला ब्रेक लेते हैं....रात में दो पैग रम मारेंगे...सारे गम सुबह तक
साफ....फिर वही जन-गण-मन गाएगा हरचरना....फटा सुथन्ना पहने....अपना लड़का
है साहब...सपने तो देखो स्साले के....लीडर बनना चाहता है....
आइए...भारतीय राजनीति के मछली बाजार
में...मैं आपका स्वागत करता हूं...हिचकिए मत...चले आइए...अगर आप शरीफ
हैं...इस बाजार से आपका पहले वास्ता नहीं पड़ा है...तो नाक पर रूमाल रख
लीजिए...सड़ांध है यहां...आप गश खाकर गिर सकते हैं...मुझे आदत है...मैं
आम आदमी हूं...इस बाजार के फरमान ही मेरी तकदीर तय करते हैं...मुझे कितना
कमाना है...कितना खाना है...कितना बोलना है...कितना लिखना है...सब यही
लोग बताते हैं....चौंकिए मत...हम गुलाम नहीं हैं...आजाद हैं...और ये जो
बाजार है ना साहब....इसे हमारे लोग संसद कहते हैं...इसमें हमारे नुमाइंदे
रहते हैं...कितने प्यारे चेहरे हैं...वो कहते हैं ना साहब के....
"सियासी आदमी की शक्ल तो प्यारी निकलती है...
मगर जब गुफ्तगू करता है चिंगारी निकलती है...
कुछ ऐसा ही है यहां....हम तो इसकी पूजा करते थे...लेकिन पिछले कुछ सालों
से हमारा इस मंदिर से भरोसा उठ गया...कुछ अजीब सा माहौल है यहां...पहले
मुद्दों पर बहस होती थी....आज बहस में से लोग मुद्दे निकालते हैं....चोर
हैं यहां...उचक्के हैं...दमड़ी के दलाल हैं सब...बच के ना रहे तो चमड़ी
भी उधेड़ लेंगे...देखा ना आपने....नोटों की गड्डियां....हमारे मंदिर
में...चलो साहब...इसी बहाने देश के करोड़ों लोगों ने करोड़ रूपया तो देख
लिया...नहीं तो सबसे बड़ी नोटों की गड्डी तो तभी दिखती हैं जब बाबू जी
बहन की शादी के लिए दहेज का पैसा घर लाते हैं...खैर संसद में चोर-उचक्के
बैठेंगे तो यही होगा ना...अरेरेरे...घबराइये मत...ये शोर तो यहां आम बात
है....ये शोर ना हो तो बाजार का फील ही नहीं होता...ऊंघने लगते हैं
लोग...देश जाए खड्डे में...बहस न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर...और यहां
सिर्फ उखाड़े गए गड़े मुर्दे...खींचा-तानी चलती रही...खूब कीचड़ उछाले
गए....अपनी पीठ ठोंकी गई...क्या करें साहब...अब सीना ठोंकने की किसी की
औकात नहीं रही...कैरेक्टर नहीं रहा ना साहब....सब अपने जुगाड़
में...सरकार गिरी तो अलाने का फायदा....नहीं गिरी तो फलाने का....देश गया
खड्डे में...शशिकला का बेटा कलेक्टर बनेगा...लोग मुस्कुरा रहे थे
साहब...बिजली नहीं है...पानी नहीं...पता नहीं बड़ा होगा भी या
नहीं....विदर्भ का है ना साहब...क्या पता...वो तो रोटी बेलता है...खेलने
वाले तो यहां बैठे हैं...सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं...सबकी 'पाइपलाइन'
में बड़े-बड़े प्रोजेक्ट हैं...पाइपलाइन समझते हैं ना....ये गड्डियां उसी
पाइपलाइन से आती हैं...खैर...दो दिन खूब मजा आया...दुश्मन दोस्त बन
गए....दोस्त दुश्मन बन गए....जिन घोड़ों को चार साल किसी ने घास नहीं
डाली...आज घुड़दौड़ के समय उन्होंने खूब नखरे दिखाए...जम के कलाबाजियां
खाईं....जब तक पेट नहीं भरा...हिनहिनाए नहीं....हमारा देश सेकुलर
है...हमें भी इन्हीं लोगों ने बताया...कौन सेकुलर हो कौन नहीं...यही हमें
बताते हैं...खैर साहब...शुरूआत विडंबना से हुई थी...खत्म भी वहीं से करते
हैं....विडंबना ये कि जो बहस मंहगाई और आत्महत्या के मुद्दे पर होनी
चाहिए थी...वो न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर हो रही थी...विदेश नीति आम
आदमी नहीं जानता भाई...उसे ये पता है कि प्याज और पेट्रोल मंहगा होगा तो
सरकार को वोट नहीं देना है...विडंबना ये कि देश के सम्मान का प्रतीक रहे
इस मंदिर में जेल से सवारियां आती हैं...विडंबना ये कि स्वस्थ बहस की
परंपरा दम तोड़ रही है...संसद में लहरा रही हैं नोटों की
गड्डियां....कितनी गिनाएं...कहां तक गिनोगे...छोड़ो साहब...चलो...पेप्सी
वाला ब्रेक लेते हैं....रात में दो पैग रम मारेंगे...सारे गम सुबह तक
साफ....फिर वही जन-गण-मन गाएगा हरचरना....फटा सुथन्ना पहने....अपना लड़का
है साहब...सपने तो देखो स्साले के....लीडर बनना चाहता है....
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