Wednesday, July 23, 2008

जिसका गुन हरचरना गाता है....

मिथिलेश कुमार सिंह

आइए...भारतीय राजनीति के मछली बाजार
में...मैं आपका स्वागत करता हूं...हिचकिए मत...चले आइए...अगर आप शरीफ
हैं...इस बाजार से आपका पहले वास्ता नहीं पड़ा है...तो नाक पर रूमाल रख
लीजिए...सड़ांध है यहां...आप गश खाकर गिर सकते हैं...मुझे आदत है...मैं
आम आदमी हूं...इस बाजार के फरमान ही मेरी तकदीर तय करते हैं...मुझे कितना
कमाना है...कितना खाना है...कितना बोलना है...कितना लिखना है...सब यही
लोग बताते हैं....चौंकिए मत...हम गुलाम नहीं हैं...आजाद हैं...और ये जो
बाजार है ना साहब....इसे हमारे लोग संसद कहते हैं...इसमें हमारे नुमाइंदे
रहते हैं...कितने प्यारे चेहरे हैं...वो कहते हैं ना साहब के....
"सियासी आदमी की शक्ल तो प्यारी निकलती है...
मगर जब गुफ्तगू करता है चिंगारी निकलती है...
कुछ ऐसा ही है यहां....हम तो इसकी पूजा करते थे...लेकिन पिछले कुछ सालों
से हमारा इस मंदिर से भरोसा उठ गया...कुछ अजीब सा माहौल है यहां...पहले
मुद्दों पर बहस होती थी....आज बहस में से लोग मुद्दे निकालते हैं....चोर
हैं यहां...उचक्के हैं...दमड़ी के दलाल हैं सब...बच के ना रहे तो चमड़ी
भी उधेड़ लेंगे...देखा ना आपने....नोटों की गड्डियां....हमारे मंदिर
में...चलो साहब...इसी बहाने देश के करोड़ों लोगों ने करोड़ रूपया तो देख
लिया...नहीं तो सबसे बड़ी नोटों की गड्डी तो तभी दिखती हैं जब बाबू जी
बहन की शादी के लिए दहेज का पैसा घर लाते हैं...खैर संसद में चोर-उचक्के
बैठेंगे तो यही होगा ना...अरेरेरे...घबराइये मत...ये शोर तो यहां आम बात
है....ये शोर ना हो तो बाजार का फील ही नहीं होता...ऊंघने लगते हैं
लोग...देश जाए खड्डे में...बहस न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर...और यहां
सिर्फ उखाड़े गए गड़े मुर्दे...खींचा-तानी चलती रही...खूब कीचड़ उछाले
गए....अपनी पीठ ठोंकी गई...क्या करें साहब...अब सीना ठोंकने की किसी की
औकात नहीं रही...कैरेक्टर नहीं रहा ना साहब....सब अपने जुगाड़
में...सरकार गिरी तो अलाने का फायदा....नहीं गिरी तो फलाने का....देश गया
खड्डे में...शशिकला का बेटा कलेक्टर बनेगा...लोग मुस्कुरा रहे थे
साहब...बिजली नहीं है...पानी नहीं...पता नहीं बड़ा होगा भी या
नहीं....विदर्भ का है ना साहब...क्या पता...वो तो रोटी बेलता है...खेलने
वाले तो यहां बैठे हैं...सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं...सबकी 'पाइपलाइन'
में बड़े-बड़े प्रोजेक्ट हैं...पाइपलाइन समझते हैं ना....ये गड्डियां उसी
पाइपलाइन से आती हैं...खैर...दो दिन खूब मजा आया...दुश्मन दोस्त बन
गए....दोस्त दुश्मन बन गए....जिन घोड़ों को चार साल किसी ने घास नहीं
डाली...आज घुड़दौड़ के समय उन्होंने खूब नखरे दिखाए...जम के कलाबाजियां
खाईं....जब तक पेट नहीं भरा...हिनहिनाए नहीं....हमारा देश सेकुलर
है...हमें भी इन्हीं लोगों ने बताया...कौन सेकुलर हो कौन नहीं...यही हमें
बताते हैं...खैर साहब...शुरूआत विडंबना से हुई थी...खत्म भी वहीं से करते
हैं....विडंबना ये कि जो बहस मंहगाई और आत्महत्या के मुद्दे पर होनी
चाहिए थी...वो न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर हो रही थी...विदेश नीति आम
आदमी नहीं जानता भाई...उसे ये पता है कि प्याज और पेट्रोल मंहगा होगा तो
सरकार को वोट नहीं देना है...विडंबना ये कि देश के सम्मान का प्रतीक रहे
इस मंदिर में जेल से सवारियां आती हैं...विडंबना ये कि स्वस्थ बहस की
परंपरा दम तोड़ रही है...संसद में लहरा रही हैं नोटों की
गड्डियां....कितनी गिनाएं...कहां तक गिनोगे...छोड़ो साहब...चलो...पेप्सी
वाला ब्रेक लेते हैं....रात में दो पैग रम मारेंगे...सारे गम सुबह तक
साफ....फिर वही जन-गण-मन गाएगा हरचरना....फटा सुथन्ना पहने....अपना लड़का
है साहब...सपने तो देखो स्साले के....लीडर बनना चाहता है....

तमाशा-ए -अहल-ए-करम देखते हैं

प्रभात रंजन

कल की बात है । घर से अॉफिस के दरम्यान मेरे साथ एक हादसा हुआ । हादसा कुछ यूं नहीं कि सिर-पैर- हाथ टूट जाएं । हुआ कुछ यूं कि दिमाग कि नसें झनझना गईं। मैं बस में चलता हूं और दिल्ली की बसों में आए दिन किसी न किसी ऐसी चीज का सामना होता ही रहता है कि बस चुप रह जाइए । ये हादसा जिसका जिक्र है ... लेकिन कुछ अलग था। जिस सीट के पास में खड़ा था, उसपर एक तोंदधारी महाशय मय साजो समान अपने पुत्र के साथ कुछ इस तरह बैठे थे कि जैसे तख्ते- ताउस पर बैठे हों। खैर .. बस में खड़ा आदमी एक अदद सीट की आरजू रखता है । मैं भी अपनी आरजूओं को अपनी नजरों में समेटे आगे-पीछे देख रहा था कि अचानक मेरे साथ यात्रा कर रहे मेरे साथी दीपक जी ने मेरा घ्यान इस हादसे की ओर खिंचा । सीट के ठीक ऊपर सफेद हर्फों में लिखा था ... विधायक । सीट की फिक्र कहीं सरक गई। माथे पर कुछ पसीने की बुंदे थी ...गायब हो गई। दिल्ली में सीटों के अलग- अलग तरीकें के अारक्षण मैनें देखे हैं । महिलाओं का एक तिहाई सीटों पर दावा तो खैर काफी पहले से है ... लेकिन जब से प्राइवेट बसें चलनी शुरू हुई , कुछ और नई श्रेणियां भी बनी ।पहले स्वतंत्रता सेनानी और बाद में स्वतंत्रा सेनानी के विधवाअों के लिए भी एक सीट की गुंजायश बनाई गई । दिल्ली के बस मालिकों की ओर से ये उपहार शायद कारगील युद्ध के बाद दिया गया था । वरिष्ठ नागरिकों का भी ख्याल प्राइवेट बसों में रखा गया और एक सीट खासतौर पर उन्हें भी मुहैया कराई गई। वरिष्ठों के आगे वाली सीट पहले से ही विकलांगों के लिए थी , आज भी है । खैर इतने सारे आरक्षणों के बाद जब विधायकों के लिए सीट का इंतजाम देखा तो , कलेजा मुंह को आ गया । कई भाव एक साथ आए और इतनी जल्दी आए कि आखिर में कुछ नहीं बचा । दिल्ली की बात तो जाने दीजिए , हिन्दुस्तान का कोई भी विधायक बसों में सफर नहीं करता होगा, तो विधायक के लिए दिल्ली की किसी बस में सीट सुरक्षित रखने का क्या आशय हो सकता है? मुमकिन है बस- मालिक अपने तरीके से लोकतंत्र का सम्मान करना चाहता हो। लेकिन विधायक जी को सीट मुहैया कराने के बाद सोंचने वाली बात ये है कि एक आम नागरिक के लिए कुल कितनी सीटें शेष रह गईं । एक और बात जिसपर मेरी तरह हर गरीब और असहाय नागरिक ने ध्यान दिया होगा । सरकारी बसों में कंडक्टर के लिए पीछे की ओर एक सीट खासतौर पर बनी होती है ,जिसपर किसी भी हालत में कोई यात्री नहीं बैठ सकता। पुरी सीट पर पलथी मार के कंडक्टर साहब कुछ ऐसे बैठते है कि जैसे बस उनके पुरखों ने उन्हे विरासत में दी हो और दुसरों को बिठा कर वे एहसान कर रहे हों। खैर ये तो सरकारी महकमे की बात है... प्राइवेट बसें तो इस मामले में भी आगे निकल गईं । कंडक्टर के लिए एक सीट पीछे तो थी ही , एक सीट आगे भी रखी गईं । ये अलग बात है कि इन दोनों सीटों पर कंडक्टर साहब शायद ही कभी बैठते हैं। सभी जानते है कि कंडक्टर साहब के कोटे की ये सीटें किसी लड़की या महिला को बतौर उपहार मुहैया कराई जाती हैं। अगर गलती से आप बैठ गए तो ये कंडक्टर की शान में गुस्ताखी मानी जाएगी , लेकिन अगर कोई महिला उस सीट पर नहीं बैठकर खड़ी रह जाए तो ये कंडक्टरी मेहमांनवाजी की तौहीन मानी जा सकती है ।वैसे ये तौहीन अक्सर नहीं की जाती । खैर, अब नई- पुरानी सभी श्रेणियों को दी गईं सुरक्षित सीटों में अगर कंडक्टर साहब की दो सीटें भी जोड़ दी जाए तो बस में आम आदमी के लिए कोई जगह नहीं बचती । है भी नहीं । अब बचा पत्रकार ... वैसे तो विधायक की तरह ये जन्तु भी बसों में शायद ही सफर करता है । अगर बिल्कुल ही नया हो और किसान - परिवार से हो तो अलग बात है , वरना हीरो- होन्डा तक तो उसकी पहुंच हो ही गई है। पॉल गोमरा का स्कूटर जब से दुर्घटनाग्रस्त हुआ , तब से कोई पत्रकार स्कूटर नहीं चलाता । लेकिन कुछ मेरे जैसे पत्रकार अभी भी है जिन्हें अपनी सवारी आज भी मयस्सर नहीं और बसों में खड़े - खड़े सफर करना जिनका नसीब है । सो चला जा रहा हूं और सोंच रहा हूं कि जाने कब दिल्ली के बस मालिकों को अक्ल आएगी और वे पत्रकारों के लिए भी एक सीट सुरक्षित करने का फैसला करेंगे ।

Sunday, July 13, 2008

एक ताज़ा खबर और लड़की

मिथिलेश कुमार सिंह
(इस ब्लाॉग पर कविता को लेकर खासी चर्चा हो चुकी है ... और इसीलिए किसी भी कविता को यहां देने से पहले एक संशय लाजिमी था... फिर भी मिथिलेश की ये कविता एक बार पढ़े जाने की मांग करती है ... इसलिए इसे सरेआम करने को मजबुर हूं .... मिथिलेश अच्छे टीवी पत्रकार तो हैं ही , सोंचते भी अच्छा हैं )


आपको नहीं लगता...कभी-कभी...
कि लड़कियां भी खबरों की तरह होती हैं...
कुछ अच्छी...कुछ बुरी...
कुछ टाइम पास...
कुछ बेकार...कुछ चलने वाली लड़कियां/खबरें
कुछ में टीआरपी होती है...
जैसे कुछ लड़कियों में...
कुछ खबरें अच्छी होती हैं...
लेकिन टीआरपी नहीं देतीं...
इसलिए नहीं चलतीं...
अच्छी खबरों की चर्चा कम ही होती है...
जैसे अच्छी लड़कियों की...
हर कोने में लोगों की निगाहें
सिर्फ नई खबरों ? पर होती हैं...
जैसे हर मर्द ? की नई लड़कियों पर...
खबरें जुटाई जाती हैं...
जैसे लड़कियां...
फिर शुरू होती है
खबरों की नक्काशी...
उन्हें सजाया जाता है...
जैसे लड़कियों को सजाते हैं...
खबरों को देखने लायक बनाते हैं...
जैसे लड़कियों की नुमाइश होती है...
नक्काशीदार खबर...
तराशी हुई लड़की...
तैयार है परोसने के लिए...
फिर खबरों से खेलते हैं...
जैसे लड़कियों से...
लोग चटखारे लेंगे...
लार टपकाएंगे...
अफसोस करेंगे...
जांघें खुजलाएंगे...
फिर निगाहें गड़ा देंगे अगली खबर पर...
जैसे अगली लड़की पर...
गुम हो जाती हैं खबरें ...
इस पूरी प्रक्रिया में...
सजाने और परोसने में...
जैसे कहीं गुम हो जाती है लड़की...

Sunday, June 22, 2008

दि थर्ड वर्ल्ड

गुलज़ार साहब की नज़्म
(आज किताबों की धुल पोंछते हुए करीब एक दशक से ज्यादा पुरानी एक  मैगजीन में गुलज़ार साहब की  ये नज़्म मिल गई । तब नई थी और मौज़ूं भी... । पढ़ने में  आज भी अच्छी लगी तो ले आया )


जिस बस्ती में आग  लगी थी कल की रात 

उस बस्ती में मेरा  कोई नहीं  रहता था,

औरतें बच्चे, मर्द कई और उम्र रसीदा लोग सभी , वो

जिनके सर पे जलते हुए शहतीर गिरे 

उनमें मेरा कोई नहीं था ।

स्कूल जो कच्चा पक्का था और बनते बनते खाक हुआ

जिसके मलबे में वो सब कुछ दफ़न हुआ जो उस बस्ती का 

मुस्तक़बिल कहलाता था

उस स्कूल में-

मेरे घर से कोई कभी पढ़ने न गया न अब जाता था

न मेरी दुकान थी कोई 

न मेरा सामान कहीं ।

दूर ही दूर से देख रहा था

कैसे कुछ खुफ़िया हाथों ने जाकर आग लगाई थी ।।

जब से देखा है दिल में ये खौफ बसा है

मेरी बस्ती भी वैसी ही एक तरक्की करती बढ़ती बस्ती है 

और तरक्कीयाफ़्ता कुछ लोगों को ऐसी कोई बात पसंद नहीं।।

Thursday, June 12, 2008

तब तो ओबामा हार जाएगें।

जैसे ही हिलेरी क्लिंटन की दावेदारी ख़त्म हुई वैसे ही कहा ये जाने लगा कि हिलेरी ओबामा का समर्थन करेगी। इसके बाद से ही हिलेरी के समर्थक असमंजस में हैं। अमेरिका में कई सर्वेक्षण इस तरफ इशारा कर रहे हैं कि हिलेरी को समर्थन देने वाले कई वर्ग ओबामा का समर्थन करने के मूड में नहीं है। उनका वोट सीधे रिपब्लिकन राष्ट्रपति उम्मीदवार जॉन मेक्कन को जा सकता है। इस दौड़ में सबसे आगे हैं, वो श्वेत अमेरिकी जो कामकाजी वर्ग यानी वर्किंग क्लास से आते हैं। दूसरा सबसे बड़ा वर्ग है हिलेरी को समर्थन देने वाली महिलाएं। ये महिलाएं हिलेरी के बाद अब मेक्कन की ओर देख रही हैं।
शिकागो ट्रिब्यून मैगज़ीन ने 2004 में ही छापा था कि ओबामा को इसलिए कुछ श्वेत पसंद करते हैं, क्योंकि वो पूरी तरह काली नस्ल के नहीं है। मतलब ये कि चूंकि ओबामा की मां एक अमेरिकी श्वेत और पिता अफ्रीकी, इसलिए उन्हें पूरी तरह अश्वेत नहीं माना जा सकता, लेकिन अगर वो पूरी तरह अफ्रीकी नस्ल के होते तो। आज अमेरिका में ये बहस चरम पर है कि बराक ओबामा देश की विदेश नीति और आर्थिक नीति को संभालने और आगे बढ़ाने के लिए सही आदमी नहीं है। एक बड़ा वर्ग ये प्रचारित करने में जुटा है कि अमेरिका ओबामा के हाथों में सुरक्षित नहीं है।
अगर ओबामा हारते हैं तो उसका एक बड़ा कारण होगा उनका पूरा नाम ही। यानी "बराक हुसैन ओबामा" । इस नाम में लगा हुसैन बड़ा गुल खिला सकता है। लेकिन साथ ही महाशक्ति को आज इस नाम की ज़रुरत भी है, ख़ासकर 9/11 के मुस्लिम विरोधी अभियान के बाद। अमेरिका के जाने टिप्पणीकार अपने एक लेख में लिखते हैं कि ओबामा के साथ ही नस्लवाद का अंत हो जाएगा। क्या नस्लवाद के अंत के लिए ओबामा का इंतज़ार था जिसे ख़ुद मार्टिन लूथर किंग जूनियर भी नहीं मिटा सके। अमेरिका की एक पत्रिका लिखती है कि अमेरिकी की आर्थिक मंदी, बढ़ती महंगाई, विदेशी नीति की असफलता और इराक़ जैसे घावों के बाद भी अगर रिपब्लिकन उम्मीदवार ओबामा को हरा देता है तो इसका सिर्फ एक ही कारण होगा और वो है नस्लवाद। जाने माने इतिहासकार पॉल स्ट्रीट मानते हैं कि ओबामा को नस्लवादियों का सामना करना होगा।
अंत में। क्या मैं ये साबित कर रहा हुं कि अमेरिका आज भी नस्लवादी है? अगर ऐसा है तो कुछ दूसरे तथ्यों पर नज़र डालें। वियतनाम युद्ध के दौरान मारे गए अमेरिकी अश्वेत सैनिकों की संख्या श्वेत सैनिकों के मुक़ाबले दोगुनी थी। इसी दौरान न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा, हब्शियों को वियतनाम में अपने देश के लिए अपने हिस्से की लड़ाई करने का पहली बार मौका दिया गया है। यही नहीं उन काले सैनिकों को अलग दफनाया भी गया। ये तो हुई थोड़ी पुरानी बात, कुछ नए तथ्य। आज अमरीका की कुल आबादी के 12 फ़ीसदी अफ्रीकी सभी सशस्त्र बलों में 21 फीसदी और अमेरीकी सेना में 29 फीसदी हैं, जबकि वे अमरिका की कुल आबादी का सिर्फ 12 फीसदी है। इराक़ में भी यहीं अश्वेत बलिदान देने में आगे हैं। क्या ये सिर्फ एक संयोग है। मतदान का अधिकार लेने के लिए कड़े संघर्ष के बाद आज 14 लाख अफ्रीकी अमरीकियों यानी वोट देने वाले अश्वेत लोगों की 13 फीसदी आबादी को मामूली अपराधों के कारण मताधिकार से वंचित कर दिया गया है। यानी तब तो ओबामा हार जाएगें।

Saturday, June 7, 2008

ख़बर ख़ास है...

        प्रभात रंजन


इतिहास  को भले ही  बदला नहीं जा सके , लेकिन आंखो में अगर शर्म हो तो अपनी कारगुजारियों के िलए माफी तो मांगी ही जा सकती है। ब्रिटिश इतिहासकार अॉिलवर बियारर्स को भारत पर ब्रिटिश जुल्म ने इस कदर आहत किया कि, उन्होने इसके लिए सरेआम माफी मांगने का इरादा बना लिया। फिर क्या था अॉलिवर निकल पड़े अपने घोड़े पर । अंदाज थोड़ा शाही है लेकिन तेवर ठेठ हिन्दुस्तानी । दोनो हाथ जोड़कर अॉलिवर रास्ते में मिलने वाले सभी लोगो से 1857 के विद्रोह के दौरान हुए अत्याचारों की माफी मांग रहे है। खेतों में , सड़को पर - किसानो से और मजदूरों से- अॉलिवर सभी से मुखातिब होते हैं।  शिमला से शुरू हुआ इस हैम्पशायर के इितहासकार का सफर हरियाणा और दिल्ली होते हुए ,मेरठ तक जायेगा। अाखिरकार मेरठ से ही तो 1857 के विद्रोह की चिंगारी फूटी थी । बाद में बेहिसाब ताकत के बल पर  आजादी के िलए  इस पहली चीख को दबा दिया गया था। लाखों की तादाद में लोग मार डाले गए । आज 150 सालों बाद अॉलिवर इसी दमन की माफी मांग रहे है । वैसे तो तब के  ब्रिटिश हुकूमत के दामन पर और भी कई गहरे दाग है , लेकिन कभी भी ब्रिटेन की सरकार ने उसके लिए  शर्मिन्दगी नहीं दिखाई। अॉलिवर जो कुछ भी कर रहे है उसके िलए वे तारीफ के साथ - साथ हमारे प्यार के भी हकदार है । वैसे तो  माफी मांगने के बावजूद भी इतिहास  नहीं बदलता ... लेकिन कम से कम इंसानियत का तकाजा तो पूरा होता है । 


ख़बर ख़ास है... इंडिया न्यूज दिस विक का एक हिस्सा है 

Wednesday, June 4, 2008

जब तलक रिश्वत न ले हम दाल गल सकती नहीं, नाव तनख़्वाह की पानी में तो चल सकती नहीं।

आज से लगभग 60 साल पहले जोश मलीहाबादी का लिखा ये शेर उनके पहले भी लागू होता था और आज भी हर्फ-ब-हर्फ लागू होता है। ये सच्ची कहानी है कि एक बाप उस दिन बहुत खु़श हुआ। जब उसके दो बेटों में से छोटा बेटा सिविल इंजीनियर बना और टेबल के नीचे के कारोबार से कुछ ही सालों में खू़ब पैसे पीट डाले। खपरैल, दो मंज़िला इमारत में तबदील हो गई। गांव भर में उसने ऐलान किया कि "ये है मेरा लायक बेटा"। अगले दिन ही बाबूजी मोटरसाइकिल के शहर निकले। गढ़ढ़ों के बीच सड़क ढ़ूंढते-ढ़ूंढते हीरोहोंडा पस्त हो गई। उसने हाई-वे पर ऐलान कि "सब साले चोर हैं, सड़क बनाने के नाम पर इंजीनियर से लेकर ठेकेदार तक जनता को धोखा दे रहे हैं। पता नहीं इस देश का क्या होगा।"
कौटिल्य ने हज़ारों साल पहले अपने अर्थशास्त्र में लिखा था कि शासन में भ्रष्टाचार 40 तरीके से अपनी जगह बनाता है। कमाल की बात है कि आज भी उनकी बात जस की तस है। तरीके बढ़ गए हों तो कह नहीं सकते। अभी इस पर शोध करना शेष है। एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था भ्रष्टाचार विरोधी उपायों के मामले में हमें 10 में से सिर्फ 3.5 (साढ़े तीन) नंबर देती है। लेकिन ख़ुश होने वाली बात ये है कि भ्रष्टाचार की इस शर्माने वाली ऊंचाई पर अकेले हम हीं नहीं खड़े बल्कि चीन, ब्राज़ील जैसे देश भी हैं। विकसित अर्थव्यवस्था में काफी ऊपर मौजूद जापान भी सबसे भ्रष्ट देशों में गिना जाता है। हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में तो कई प्रधानमंत्रियों का नाम ही भ्रष्टाचार के आरोपों से साथ लिया जाता है।
मैं कहना चाह रहा था कि ये हमाम ऐसा है जहां सभी ये कह कर भी पल्ला नहीं झाड़ सकते कि ये अंदर की बात है। एक आकलन कहता है कि अगर भ्रष्टचार 1 फीसदी कम हो जाए तो विकास दर 1.5 फीसदी तक बढ़ सकती है। क्योंकि इसकी सबसे ज्यादा मार ग़रीबों पर पड़ती है। एक सर्वेक्षण तो ये भी कहता है कि ग़रीबों की 25 फीसदी कमाई घूस देने में ही चली जाती है। लेकिन ये चर्चा ही बेमानी है क्योंकि लगता है कि ये मुद्दा सुर्खियां तो बन जाती हैं, लेकिन हमें परेशान नहीं करती। हम इसे ठहराने लगे हैं। जयललिता से लेकर लालू तक को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि भ्रष्टाचारी होने का आरोप वोट कटने का कारण नहीं बनता। एक बदलाव ज़रुर आया है, और वो है आज अपना उल्लू सीधा करने के लिए सूचना के अधिकार का इस्तेमाल ख़ूब हो रहा है। अब तो इसके लिए बजाप्ता ऐजेंटी भी होने लगी है। मैं इधर सोच रहा हूं कि जब ये पूरी दुनिया में फैला है तो क्या हमें इस पर सिर खपाने की ज़रुरत है। ये तो आप ही बताएं ?