मंगलवार, 27 मई 2008

कविता मत लिख चिरकुट

अनामदास की कविता

(अनामदास बित्ते भर के आदमी हैं। लेकिन इन्हें लघुमानव कतई नहीं कहा जा सकता । काम-धाम कुछ खास नहीं लेकिन शागिर्द लोग उस्ताद मानते हैं। वैसे तो मेरे अच्छे मित्र है लेकिन डंडा चलाने में पूरे समतावादी हैं। इसलिए मुझ पर भी नजरे इनायत हो गई । उस पर से धमकी कि ये फ़जिहत अपने ही ब्लॉग पर छापो वरना ....। भाई साहब भाषा में थोड़े भदेस हैं।इसलिए क्षमाभाव के साथ पढिए। )

धरती को कागज बना
सागर को स्याही
और लिख....लिख मार
जो भी दिल में आये
मेरे भाई।
वेदना में लिख
भावना में लिख
कभी क्षुब्ध हो जा
फिर उत्तेजना में लिख
तेरी विस्फोटक प्रतिभा
से आतंकित कर दे , समाज को
लिख दे कुछ भी रॉकेट छाप
मिला दे धरती आकाश
लोग कहें... छाती पर हाथ धर
वो मारा
भाई वाह, लिख दिया जहां सारा।
दांत किटकिटा
सिर के बल खड़ा हो जा
कलाबाजियां खाते- खाते लिखा कर
सरेआम मत बोल
बस वक्राकार हँस
बुद्घिजीवी दिखा कर
और कुछ भी लिखा कर

बेटे,आसाराम बन
रामचरित लिख
गुलशन को गुरू बना
कटी पतंग लिख
ब्लॉगर बन
पुण्यात्माओं की पूजा कर
खबरिया चैनल से रोटी जुगाड़ के
उनकी ही मां—बैन कर।
खबर की मौत हो
चाहे मौत की खबर
बेरहम और बाजारू
पत्रकारिता को लानत भेज
टेसू बहाया कर , नैतिकता पेला कर
जमी जमाई दूकान की मसलंद पर टिककर
निर्भय पादा कर ।
लेकिन,एक छोटी सी अरज है भाई
चाहे कुछ भी लिख- पोत
उखाड़-पछाड़
हमे कोई फर्क नहीं पड़ता मगर
सिर्फ लिखने के लिए
कविता मत लिख चिरकुट
हमारी जातीय संवेदना
सिहर जाती है।

4 टिप्‍पणियां:

मिथिलेश श्रीवास्तव ने कहा…

अनामदास जी कोई बड़े भड़ासी लगते हैं। कहां थे अब तक! कहीं ये "अनामदास का पोथा' से जिंदा होकर बाहर तो निकल नहीं आए! वैसे ये चिरकुट किसको लक्ष्य किया गया है, कुछ समझ में नहीं आया।

sushant jha ने कहा…

अद्भुत है...

बाल किशन ने कहा…

अनाम दास जी का ये अंदाज बेहद मस्त है.
सीधे शब्दों मे खरी -खरी सुनाते है .
जवाब नहीं जी.
बेहद रोचक भी हैं.

बेनामी ने कहा…

मेरी समझ से चिरकुट संज्ञा नहीं विशेषण है। जाहिर है किसी विशेष के लिए प्रयोग नहीं किया गया। बाकि अनामदास ही बता पायेंगे।