शुक्रवार, 14 मई 2010

जलेबी का समाजवाद

मेरे जीवन में एक ऐसा वक्त आ गया है
जब खोने को
कुछ भी नहीं है मेरे पास
दिन, दोस्ती, रवैया
राजनीति
गपशप, घास
और स्त्री हालॉकि वह बैठी हुई है
मेरे पास... ( श्रीकांत वर्मा )
...मैं भी कह सकता हूं यह बात । अव्वल तो कई चीजे कभी हासिल नहीं हुई। कुछ मिलने के बाद खो गईं । फिर भी, जो शेष है उससे आसक्त नहीं हूं । सिवाय जलेबी के । जलेबी के साथ रोमांस बचपन में शुरू हुआ । जवानी तक चला आया है । मां मीठा कम खाने की हिदायत देती रहती हैं, लेकिन कमबख्त जलेबी से नजर आज भी नहीं चुरा पाता । हफ्ते में कम से कम दो बार चख लेता हूं । दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में जहां रहता हूं , वही गली के मोड़ पर जलेबी की एक दुकान है । माफ कीजिए , मुझे सच बोलना चाहिए । एक जलेबी बनाने वाले का ठेला है । दिन ढ़लने से पहले यूपी के गोरखपूर का रहने वाला श्याम अपनी दुकान ( ठेला ) सजा लेता है । मैदा के घोल वाले बड़े कनस्तर, एक कम गहराई वाली कड़ाही, चिमटे – चुल्हा और एक छोटू । काम की तलाश में गांव से श्याम के साथ ही चला आया है छोटू । दुकान लगने की देर भर होती है कि देखते- देखते ग्राहक ठेले पर टूट पड़ते हैं । ग्राहक यानि मुखर्जी नगर में रहने वाले प्रवासी छात्र और छात्राएं— इनमें से कई कल के बड़े आईएएस अधिकारी हैं । दुकान पर विधार्थियों की तादाद ज्यादा होती है क्योंकि आर्थिक पैमाने पर जलेबी उनकी जेब को भी पसंद आती है । पांच रुपए की जलेबी में स्वाद भी आ जाता है, शाम भी कट जाती है । एक तबका और है रिक्शा चालकों का और आसपास मजदुरी करने वालों का । दिन भर की मेहनत के बाद सुस्ताने के नाम पर ठंढा पानी पीने के लिए , मीठी जलेबी बड़ी कारगर होती है । रस में डूबी हुईं, गरम-गरम करारी जलेबियां जो सुख देती है , उसे थके हुए चेहरों पर देखा जा सकता है, बयान नहीं किया जा सकता । इस तरह महानगर में आए दूर कस्बे - देहात के नौजवान हों या मजदुर , जलेबी दोनो को बेहद पसंद है । श्याम के ठेले पर कार से उतर कर जलेबी लेने वाले भी अच्छी तादाद में आते हैं और मम्मियों का हाथ पकड़े छोटे बच्चे भी । सभी एक दुसरे के बगल में खड़े होकर मजे से जलेबियां खाते हैं। पढ़ी लिखी नौजवान पीढ़ी को किसी रिक्शेवाले के बगल में खड़ा होकर जलेबी खाने में कोई गुरेज नहीं होता । कार वालों को मजदुरों से घिन नहीं आती। । देश की सबसे सस्ती मिठाई, अपनी चासनी में सबको एक साथ डूबा लेती है । महानगर में गली- गली मिठाई की ब्रांड दुकाने हैं ,लेकिन क्या ऐसा नजारा वहां मुमकिन है? अगर देखा जाए तो मुखर्जी नगर ही क्यों , कहीं भी जलेबी का ठेला समाजवाद का अनोखा प्रतीक है । एक स्वाद जो सबके लिए है और सबको मयस्सर है ।
और आखिर में फैज साहब का एक शेर –
आस उस दर से टूटती नहीं
जाके देखा,न जाके देख लिया

2 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

काशः समाजवाद ला पाती जलेबियाँ!
यूँ मन न समझाना पड़ता।

alok ranjan ने कहा…

बहुत खूब... लोग जलेबी का इस्तेमाल बड़े नेगेटिव रूप में करते हैं... लोगों को जलेबी और उसके भाई इमरती की तरह टेढ़े होने की संज्ञा दी जाती है... लेकिन आपने जलेबी की एक नयी परिभाषा दी.. बहुत बढ़िया...