शनिवार, 7 जून 2008

ख़बर ख़ास है...

        प्रभात रंजन


इतिहास  को भले ही  बदला नहीं जा सके , लेकिन आंखो में अगर शर्म हो तो अपनी कारगुजारियों के िलए माफी तो मांगी ही जा सकती है। ब्रिटिश इतिहासकार अॉिलवर बियारर्स को भारत पर ब्रिटिश जुल्म ने इस कदर आहत किया कि, उन्होने इसके लिए सरेआम माफी मांगने का इरादा बना लिया। फिर क्या था अॉलिवर निकल पड़े अपने घोड़े पर । अंदाज थोड़ा शाही है लेकिन तेवर ठेठ हिन्दुस्तानी । दोनो हाथ जोड़कर अॉलिवर रास्ते में मिलने वाले सभी लोगो से 1857 के विद्रोह के दौरान हुए अत्याचारों की माफी मांग रहे है। खेतों में , सड़को पर - किसानो से और मजदूरों से- अॉलिवर सभी से मुखातिब होते हैं।  शिमला से शुरू हुआ इस हैम्पशायर के इितहासकार का सफर हरियाणा और दिल्ली होते हुए ,मेरठ तक जायेगा। अाखिरकार मेरठ से ही तो 1857 के विद्रोह की चिंगारी फूटी थी । बाद में बेहिसाब ताकत के बल पर  आजादी के िलए  इस पहली चीख को दबा दिया गया था। लाखों की तादाद में लोग मार डाले गए । आज 150 सालों बाद अॉलिवर इसी दमन की माफी मांग रहे है । वैसे तो तब के  ब्रिटिश हुकूमत के दामन पर और भी कई गहरे दाग है , लेकिन कभी भी ब्रिटेन की सरकार ने उसके लिए  शर्मिन्दगी नहीं दिखाई। अॉलिवर जो कुछ भी कर रहे है उसके िलए वे तारीफ के साथ - साथ हमारे प्यार के भी हकदार है । वैसे तो  माफी मांगने के बावजूद भी इतिहास  नहीं बदलता ... लेकिन कम से कम इंसानियत का तकाजा तो पूरा होता है । 


ख़बर ख़ास है... इंडिया न्यूज दिस विक का एक हिस्सा है 

3 टिप्‍पणियां:

बाल किशन ने कहा…

सहमत हूँ.

Udan Tashtari ने कहा…

पढ़ा. आभार इस समाचार को लाने के लिए.

MANISH PANDEY GORAKHPUR ने कहा…

BAHUT ACHHA LAGA